महाराष्ट्र में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन ग्रोथ सिर्फ टू-व्हीलर्स तक सीमित है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि **2030** तक **30%** ईवी एडॉप्शन के लक्ष्य के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और कमर्शियल व्हीकल्स में तेजी लाना जरूरी है, सिर्फ रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों से काम नहीं चलेगा।
आंकड़ों का सच
महाराष्ट्र के पास भारत का दूसरा सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक व्हीकल फ्लीट है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में रजिस्ट्रेशन में 13% का उछाल देखा गया है, लेकिन सरकारी आंकड़ों के पीछे की हकीकत कुछ और है। राज्य के कुल ईवी पोर्टफोलियो में 76% से 84% हिस्सेदारी अकेले टू-व्हीलर्स की है। कमर्शियल ट्रांसपोर्ट, भारी सामान ढोने वाले ट्रक और पब्लिक बसों में एडॉप्शन की रफ्तार काफी धीमी है, जो राज्य की 2025-2030 पॉलिसी के लक्ष्यों के लिए चिंता का विषय है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की राह में बाधाएं
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और व्हीकल सेल्स के बीच का गैप है। फास्ट-चार्जिंग नेटवर्क तैयार करने में ग्रिड कनेक्टिविटी और परमिट प्रोसेस की जटिलताएं बड़ी रुकावट बनी हुई हैं। कई डेवलपर्स को बिजली लोड मंजूर कराने में भारी देरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार सुस्त पड़ा है।
सुधारात्मक कदम
सरकार अब Viability Gap Funding के जरिए पब्लिक चार्जिंग स्टेशन को बढ़ावा दे रही है और 'यूनिफाइड एनर्जी इंटरफेस' (Unified Energy Interface) के जरिए चार्जिंग ऐप्स को जोड़ने की कोशिश कर रही है। फिलहाल, ड्राइवरों को अलग-अलग ऐप्स का उपयोग करना पड़ता है, जो यूजर एक्सपीरियंस को खराब करता है और फ्लीट ऑपरेटर्स की दक्षता पर असर डालता है।
रीसेल वैल्यू का संकट
इलेक्ट्रिक गाड़ियों के सेकेंडरी मार्केट में वैल्यूएशन को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। बैटरी के खराब होने (degradation) और गाड़ी की बची हुई वैल्यू (residual value) को लेकर पारदर्शिता न होने से लेंडर्स और खरीदार डर रहे हैं। जब तक बैटरी लाइफ और रीसेल वैल्यू को लेकर कोई मानक तय नहीं होता, तब तक फाइनेंसिंग और फ्लीट मैनेजमेंट में रिस्क बना रहेगा।
