Luxury Auto Market: भारत-EU ट्रेड डील की उम्मीद में ठंडी पड़ी लग्जरी कारों की बिक्री, क्या है सच?

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AuthorMehul Desai|Published at:
Luxury Auto Market: भारत-EU ट्रेड डील की उम्मीद में ठंडी पड़ी लग्जरी कारों की बिक्री, क्या है सच?

भारत के लग्जरी कार बाजार में फिलहाल सुस्ती छाई है। खरीदार इस उम्मीद में अपनी खरीदारी टाल रहे हैं कि भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के बाद कीमतें घटेंगी। हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह उम्मीद हकीकत से दूर हो सकती है, क्योंकि भारत में बिकने वाली ज्यादातर लग्जरी गाड़ियां यहीं असेंबल होती हैं।

भारतीय लग्जरी ऑटो मार्केट फिलहाल अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। जनवरी 2026 में संपन्न हुई भारत-EU ट्रेड डील की खबर के बाद से खरीदारों में यह धारणा बनी है कि लग्जरी कारों पर लगने वाली भारी इंपोर्ट ड्यूटी में जल्द ही भारी कटौती होगी। इसी उम्मीद में कई ग्राहक शोरूम तो जा रहे हैं, लेकिन बुकिंग करने से बच रहे हैं। मार्केट में चर्चा है कि कारों की कीमतों में 35% तक की कमी आ सकती है, जिससे शॉर्ट टर्म में सेल्स वॉल्यूम पर दबाव देखा जा रहा है।

इंपोर्ट ड्यूटी बनाम लोकल असेंबली की सच्चाई

निवेशकों और बाजार के जानकारों के लिए यह समझना जरूरी है कि ट्रेड डील का असर सीमित क्यों है। FTA के तहत फुली बिल्ट यूनिट्स (CBU) पर इंपोर्ट ड्यूटी को अगले 5 से 10 साल में 110% से घटाकर 10% करने का लक्ष्य है, लेकिन इसमें 2,50,000 वाहनों का कोटा भी तय है।

सबसे अहम बात यह है कि भारत में लग्जरी सेगमेंट की लगभग 95% गाड़ियां, जैसे कि Mercedes-Benz और BMW, भारत में ही 'Completely Knocked Down' (CKD) किट्स के जरिए असेंबल की जाती हैं। चूंकि इन कारों पर इंपोर्ट ड्यूटी का वह भारी भरकम बोझ नहीं होता जो सीधे विदेश से आई कारों पर लगता है, इसलिए ट्रेड डील का रिटेल कीमतों पर असर न के बराबर होगा। ऐसे में ग्राहकों की उम्मीदों और वास्तविकता के बीच का यह अंतर जल्द ही सेंटीमेंट को बदल सकता है।

मैन्युफैक्चरर्स की रणनीति और निवेशकों के लिए संकेत

बुकिंग्स में अस्थायी सुस्ती के बावजूद, कंपनियां अपनी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ रणनीति पर काम कर रही हैं। Maserati जैसी कंपनियां अपने शोरूम्स का विस्तार कर रही हैं। निवेशकों को अब आने वाली तिमाहियों के सेल्स डेटा पर नजर रखनी चाहिए। यदि कंपनियां अपनी इन्वेंट्री क्लियर करने के लिए डिस्काउंट का सहारा लेती हैं, तो मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। फिलहाल, मार्केट इस बात पर ध्यान दे रहा है कि कंपनियां ग्राहकों की गलत उम्मीदों को कैसे मैनेज करती हैं और क्या मांग में सुधार आता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.