Keto Motors ने भारतीय इलेक्ट्रिक बस मार्केट में कदम रख दिया है। कंपनी ने अपनी 9-मीटर लंबी Urbanova KE9 इलेक्ट्रिक बस लॉन्च की है, जो शहरी और संस्थागत परिवहन के लिए डिज़ाइन की गई है। साथ ही, कंपनी तेलंगाना में ₹300 करोड़ का निवेश करके अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ा रही है।
Keto Motors का इलेक्ट्रिक बस सेगमेंट में धमाकेदार एंट्री!
Keto Motors ने आखिरकार भारतीय इलेक्ट्रिक बस मार्केट में अपनी धाक जमा दी है। कंपनी ने अपनी नई 9-मीटर लंबी Urbanova KE9 इलेक्ट्रिक बस को लॉन्च किया है। यह बस खास तौर पर शहरों के अंदर चलने वाले ट्रांसपोर्ट और संस्थागत इस्तेमाल के लिए तैयार की गई है। इस बस में एक बार में 31 यात्री बैठ सकते हैं और इसका लो-फ्लोर डिज़ाइन (900 mm) यात्रियों के चढ़ने-उतरने को आसान बनाता है।
दमदार फीचर्स और रेंज
Urbanova KE9 में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS) और इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक पावर स्टीयरिंग जैसे बेहतरीन फीचर्स दिए गए हैं। कंपनी का दावा है कि यह बस एक बार फुल चार्ज होने पर 150 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज आसानी से दे सकती है।
तेलंगाना में प्रोडक्शन बढ़ाने की तैयारी
इस लॉन्च के पीछे कंपनी की तेलंगाना सरकार के साथ हुई लगभग ₹300 करोड़ की बड़ी डील का हाथ है। यह पैसा कंपनी की मौजूदा 20 एकड़ की Jadcherla प्रोडक्शन यूनिट को बढ़ाने और तेलंगाना EV मोबिलिटी वैली में एक नई ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने में खर्च होगा। कंपनी का कहना है कि अगले 3 सालों में वे अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी को कई गुना बढ़ा लेंगे।
नई रणनीति: सिर्फ गाड़ी नहीं, पूरा सॉल्यूशन!
Keto Motors अब सिर्फ गाड़ियां बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी का प्लान है कि वे गाड़ियों की सप्लाई के साथ-साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और फ्लीट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर जैसी चीजें भी इंटीग्रेट करें। यानी, अब वे एक फुल-स्टैक कमर्शियल मोबिलिटी सॉल्यूशन प्रोवाइडर बनना चाहते हैं।
मार्केट में कड़ी टक्कर
हालांकि, निवेशकों की नजर इस बात पर भी है कि कंपनी कैसे Tata Motors और Olectra Greentech जैसी स्थापित कंपनियों से मुकाबला करेगी, जिन्होंने पहले ही बड़े सरकारी ऑर्डर हासिल कर लिए हैं।
आगे क्या? जोखिम और नजर रखने लायक बातें
इस नई रणनीति में कुछ चुनौतियां भी हैं। नई टेक्नोलॉजी को अपनाना और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना काफी महंगा सौदा हो सकता है। साथ ही, कंपनी का तेलंगाना पर निर्भर रहना क्षेत्रीय नियमों और EV पॉलिसी पर भी असर डाल सकता है। निवेशकों को आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या कंपनी सरकारी ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन्स और बड़े क्लाइंट्स से बड़े ऑर्डर हासिल कर पाती है, ताकि हाई मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को कंट्रोल किया जा सके। नई यूनिट के लगने की टाइमलाइन पर भी नजर रखनी होगी, ताकि पता चल सके कि कहीं इसमें देरी या लागत बढ़ने जैसी समस्याएं तो नहीं आ रही हैं।
