JBM Auto का EV बस मार्केट में जलवा! बाकी कंपनियां पीछे क्यों? जानिए वजह

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AuthorNeha Patil|Published at:
JBM Auto का EV बस मार्केट में जलवा! बाकी कंपनियां पीछे क्यों? जानिए वजह
Overview

भारत में इलेक्ट्रिक बसों की कुल बिक्री मई 2026 में **7.2%** घट गई, लेकिन JBM Auto ने **48.8%** मार्केट शेयर पर कब्जा कर लिया। यह दिखाता है कि कैसे कुछ कंपनियां आगे बढ़ रही हैं, जबकि बाकी फाइनेंसिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से जूझ रही हैं।

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एग्जीक्यूशन में बड़ा अंतर

इलेक्ट्रिक बस मार्केट में रजिस्ट्रेशन के नए आंकड़े एक बड़ा अंतर दिखा रहे हैं। अप्रैल में जहां कुल 347 यूनिट बिकी थीं, वहीं मई में यह संख्या घटकर 322 यूनिट रह गई। लेकिन इस गिरावट के बीच JBM Auto ने अपनी बिक्री दोगुनी करके 157 यूनिट तक पहुंचा दी। यह सिर्फ मार्केट लीडरशिप नहीं, बल्कि बेहतरीन लॉजिस्टिक्स का नतीजा है। जिन कंपनियों के पास हाई-वोल्टेज ग्रिड कनेक्शन और डिपो की जगह जैसी जरूरी चीजें नहीं हैं, वे ऑर्डर होने के बावजूद डिलीवरी नहीं कर पा रही हैं।

मार्केट परफॉर्मेंस की तुलना

जो कंपनियां लंबे समय के ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट (GCC) साइकिल का सामना करने के लिए मजबूत बैलेंस शीट नहीं रखतीं, उन्हें अभी मार्केट की अस्थिरता भारी पड़ रही है। PMI Electro Mobility, जो पहले मार्केट लीडर थी, की बिक्री 50% से ज्यादा घट गई। वहीं, Olectra Greentech की बिक्री अप्रैल में सिर्फ 1 यूनिट से मई में 47 यूनिट पर पहुंच गई, जो सप्लाई चेन और साइट की तैयारी में आने वाली दिक्कतों को दर्शाती है। पैसेंजर कार सेगमेंट के उलट, जहां स्टॉक डीलर को भेजा जा सकता है, वहीं इलेक्ट्रिक बस निर्माताओं को सीधे स्टेट ट्रांसपोर्ट डिपो की फिजिकल तैयारी पर निर्भर रहना पड़ता है।

निवेशकों के लिए खतरे की घंटी

बढ़त के आंकड़ों के पीछे वो बड़े खतरे छिपे हैं जिन्हें निवेशक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। मुख्य समस्या मांग की नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर की है। एक डिपो को हाई-वोल्टेज चार्जिंग के लायक बनाने में ₹1 करोड़ से ज्यादा का खर्च आता है, वो भी चार्जिंग स्टेशन लगने से पहले। इसके अलावा, बिजली बोर्ड से मंजूरी मिलने में होने वाली देरी भी ग्रोथ पर लगाम लगा रही है। मैन्युफैक्चरर्स के लिए, इसका मतलब है कि रेवेन्यू मिलने में बाहरी सरकारी अड़चनों के कारण देरी हो रही है। साथ ही, लेंडर्स EV बस एसेट्स के रेसिडुअल वैल्यू और बैटरी की लाइफ को लेकर अभी भी संशय में हैं। इस फाइनेंसिंग गैप के चलते मैन्युफैक्चरर्स को बड़ा क्रेडिट रिस्क उठाना पड़ता है या सख्त कोलैटरल शर्तें माननी पड़ती हैं, जिससे रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) कम हो जाता है और फ्री कैश फ्लो पर असर पड़ता है।

भविष्य का अनुमान और सेक्टर की मजबूती

सरकारी खरीद, खासकर 'PM e-Bus Sewa' पहल, डिमांड को एक आधार देती है, लेकिन प्राइसिंग पावर को सीमित करती है। जैसे-जैसे इंडस्ट्री पायलट प्रोजेक्ट से बड़े पैमाने पर बेड़े के नवीनीकरण की ओर बढ़ रही है, कर्ज को मैनेज करने और लिक्विड ऑपरेशनल कैपिटल बनाए रखने की क्षमता ही लॉन्ग-टर्म सर्वाइवर्स तय करेगी। मार्केट का अनुमान है कि जब तक सरकार प्राइवेट ऑपरेटर्स के लिए फाइनेंसिंग की दिक्कतों को दूर नहीं करती, तब तक यह सेक्टर सिर्फ एक कशमकश का खेल बना रहेगा, जहां सिर्फ मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियां ही ऑर्डर लेने और रजिस्ट्रेशन कराने के बीच का अंतर पाट पाएंगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.