इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को बड़ा झटका लगा है। भारी निवेश की शर्तों और कड़े नियमों के चलते किसी भी ग्लोबल ऑटोमेकर ने इस स्कीम के लिए आवेदन नहीं किया है, जिससे भारतीय EV बाजार में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखेगा।
भारत सरकार की ओर से ग्लोबल EV मैन्युफैक्चरर्स को लुभाने के लिए शुरू की गई योजना पूरी तरह बेअसर साबित हुई है। साल 2024 की शुरुआत में लॉन्च की गई इस स्कीम का मकसद विदेशी कंपनियों को 15% कस्टम ड्यूटी की रियायत देना था। इसके बदले में कंपनियों को ₹4,150 करोड़ का भारी-भरकम निवेश करना था और 3 साल में 25% तथा 5 साल में 50% घरेलू वैल्यू-एडिशन का लक्ष्य पूरा करना अनिवार्य था। 21 अक्टूबर 2025 की डेडलाइन तक भारी उद्योग मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries) को एक भी आवेदन नहीं मिला।
कंपनियों ने क्यों मोड़ी नजर?
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतनी बड़ी पूंजी का निवेश करना जोखिम भरा था। Tesla, Hyundai और Volkswagen जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए भारतीय EV बाजार अभी भी एक उभरता हुआ सेगमेंट है, जहाँ डिमांड की गारंटी कम है। इसके अलावा, एडवांस EV पार्ट्स की सप्लाई चेन भारत से बाहर होने के कारण तय समय में स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग की शर्त पूरी करना कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा।
भारतीय ऑटो सेक्टर पर क्या होगा असर?
निवेशकों के नजरिए से यह एक पॉजिटिव डेवलपमेंट है क्योंकि फिलहाल भारतीय बाजार में नए विदेशी कॉम्पिटिटर्स की एंट्री नहीं हो रही है। टाटा मोटर्स (Tata Motors) और महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) जैसी घरेलू कंपनियां फिलहाल अपनी मार्केट लीडरशिप को सुरक्षित रख पाएंगी। फिलहाल एक संसदीय समिति ने इस स्कीम की शर्तों और समय-सीमा की समीक्षा करने का सुझाव दिया है। अब निवेशकों की नजर सरकार के अगले कदम पर होगी, ताकि यह देखा जा सके कि क्या भविष्य में इन नियमों को आसान बनाया जाता है या नहीं।
