एनर्जी सिक्योरिटी की राह पर इथेनॉल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए भारत सरकार इथेनॉल के इस्तेमाल को लेकर काफी गंभीर है। देश 2026 तक E20 पेट्रोल (जिसमें 20% इथेनॉल मिला होगा) को पूरे देश में लागू करने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अब सरकार E85 जैसे उच्च इथेनॉल मिश्रण (higher ethanol blends) और फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (FFVs) को भी बढ़ावा दे रही है, जो 100% तक इथेनॉल पर चल सकते हैं। इसका मुख्य मकसद ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना, तेल आयात पर होने वाले खर्च में भारी कटौती करना है। सरकार का अनुमान है कि 2025 तक इससे ₹1.44 लाख करोड़ से अधिक की बचत हो सकती है।
खेती और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ता दबाव
हालांकि, इथेनॉल की बढ़ती मांग किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा पर भारी दबाव डाल रही है। अब इथेनॉल बनाने के लिए मक्के की खेती तेजी से बढ़ रही है, और यह अक्सर दालों और तिलहनों जैसी पोषक तत्वों से भरपूर फसलों की जगह ले रही है। 2025-26 के इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) में चेतावनी दी गई है कि इससे खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है और खाने-पीने की चीजों की कीमतें और ज्यादा अस्थिर हो सकती हैं। इथेनॉल की आपूर्ति बढ़ाने के लिए, सरकार पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) में टूटे चावल (broken rice) का इस्तेमाल 25% से घटाकर 10% करने की योजना बना रही है। इससे सालाना लगभग 90 लाख टन चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए उपलब्ध हो सकता है, लेकिन यह लोगों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और उपलब्धता पर सवाल खड़े करता है।
फ्यूल एफिशिएंसी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की टक्कर
पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी (energy density) कम होती है, जिसका मतलब है कि गाड़ियों का माइलेज (mileage) कम हो जाता है। ऑटोमोबाइल कंपनियों के मुताबिक, E20 मिश्रण के साथ माइलेज में 7-8% की कमी आती है, और असल दुनिया के टेस्ट में यह 12.6% तक कम पाई गई है। जहां इथेनॉल का उच्च ऑक्टेन (octane) आधुनिक इंजनों के लिए फायदेमंद हो सकता है, वहीं प्रति वॉल्यूम उसकी कुल एनर्जी आउटपुट पेट्रोल से कम है। दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) कहीं ज्यादा एफिशिएंट (efficient) हैं और उनकी टेक्नोलॉजी तेजी से एडवांस हो रही है, जिससे लंबे समय में फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।
कचरे से इथेनॉल का बढ़ता महत्व
एक ज्यादा टिकाऊ रास्ता दूसरी पीढ़ी (2G) के इथेनॉल का है, जिसे कृषि और औद्योगिक कचरे से बनाया जाता है। भारत में गन्ने की खोई (sugarcane bagasse) जैसे कई तरह के वेस्ट (waste) उपलब्ध हैं, जो इसके लिए उपयुक्त हैं। हालांकि, इस दिशा में प्रोजेक्ट्स अभी विकसित हो रहे हैं और उन्हें बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत है ताकि ब्लेंडिंग लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे से इथेनॉल बनाना भोजन फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा से बचाता है, जिससे यह एक बेहतर विकल्प बनता है। ब्राजील का मार्केट-लिंक्ड प्राइसिंग (market-linked pricing) वाला तरीका भी खास फसलों को बढ़ावा देने के बजाय संतुलित खेती के लिए इंसेंटिव (incentive) को प्रोत्साहित कर सकता है।
जोखिमों को संतुलित करना जरूरी
इथेनॉल ब्लेंडिंग ने विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की है, लेकिन भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता अभी भी 90% से अधिक बनी हुई है। मक्के जैसी खाद्य फसलों का ईंधन के लिए इस्तेमाल 'फ्यूल बनाम फीड' (fuel vs. feed) का संघर्ष पैदा करता है, जो पशुओं के चारे की सप्लाई को प्रभावित करता है और महंगाई को बढ़ावा दे सकता है। E85 और E100 जैसे उच्च मिश्रणों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) और वाहनों की कम्पैटिबिलिटी (compatibility) भी एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए नए FFVs और फ्यूल पंप की जरूरत होगी। इसलिए, एनर्जी लक्ष्यों को हासिल करते हुए खाद्य सुरक्षा, पोषण और पर्यावरण को संतुलित रखना बहुत जरूरी है।
