EV Shift: भारत के ऑटो सप्लायर्स पर बढ़ता दबाव, चीन पर निर्भरता पहुंची **36%**

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
EV Shift: भारत के ऑटो सप्लायर्स पर बढ़ता दबाव, चीन पर निर्भरता पहुंची **36%**

भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की तरफ तेजी से बढ़ते कदम छोटे ऑटो पार्ट्स सप्लायर्स के लिए चुनौती बन गए हैं। FY26 में चीन से इंपोर्ट बढ़कर **36%** पहुंच गया है और कई MSMEs को पारंपरिक पार्ट्स से हाई-टेक EV कंपोनेंट्स की ओर शिफ्ट होने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

तकनीकी अंतर और बढ़ती निर्भरता

इलेक्ट्रिक व्हीकल के दौर में गाड़ियां अब मैकेनिकल नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स पर आधारित हैं। आंकड़ों के अनुसार, 50% से कम MSME सप्लायर्स के पास आज आधुनिक व्हीकल प्रोडक्शन की इंजीनियरिंग स्किल है। बात अगर सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन की करें, तो मात्र 10% से 14% कंपनियां ही इस काम में सक्षम हैं। यही कारण है कि कंपनियों को चीन से पुर्जे मंगाने पड़ रहे हैं, जिसका नतीजा यह है कि चीन का शेयर इंपोर्ट में 29% (FY25) से बढ़कर 36% (FY26) हो गया है।

आर्थिक चुनौतियों का दौर

केवल तकनीकी कमी ही नहीं, बल्कि लिक्विडिटी की समस्या भी सप्लायर्स की कमर तोड़ रही है। कुछ मामलों में इन्वेंटरी साइकिल 60 दिन तक खिंच गई है, जिससे रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के लिए फंड की कमी हो गई है। अनुमान है कि केवल 10% MSME सप्लायर्स ही इतने मजबूत हैं कि वे EV के लिए जरूरी तकनीकी बदलावों में निवेश कर सकें। अगर ये कंपनियां बदलाव नहीं कर पाईं, तो इनके लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल हो जाएगा।

निवेशकों के लिए चेतावनी

सरकार ने 1 सितंबर, 2026 से PM E-DRIVE स्कीम के तहत लोकलाइजेशन के सख्त नियम लागू किए हैं, जिससे कंपनियों पर कंप्लायंस का बोझ और बढ़ गया है। निवेशकों को उन ऑटो कंपोनेंट शेयरों से सावधान रहना चाहिए जो केवल पुराने पार्ट्स पर निर्भर हैं। निवेश का फैसला लेते समय यह देखें कि कंपनी का R&D खर्च कितना है और क्या उनकी बैलेंस शीट भविष्य के इस बड़े बदलाव का बोझ सहने के लिए तैयार है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.