भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर चीनी निर्माताओं की तुलना में 20-30% महंगा पड़ रहा है। IEEFA और JMK रिसर्च की एक रिपोर्ट बताती है कि इंपोर्टेड सेमीकंडक्टर और रेयर-अर्थ मैग्नेट पर भारी निर्भरता, साथ ही पुर्जों के खंडित डिज़ाइन इसकी मुख्य वजह हैं। निवेशकों को स्थानीयकरण (Localization) के प्रयासों और सरकारी PLI इंसेंटिव के धीमी गति से इस्तेमाल पर नज़र रखनी होगी।
क्या है असल दिक्कत?
ऊर्जा अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण संस्थान (IEEFA) और JMK रिसर्च & एनालिटिक्स की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) निर्माण क्षेत्र कई बड़ी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत ने 2030 तक कई EV कंपोनेंट्स के लिए 90-100% स्थानीयकरण (Localization) का लक्ष्य रखा है, लेकिन फिलहाल यह सेक्टर स्थापित चीनी सप्लायर्स की तुलना में 20-30% की लागत की मार झेल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 के फाइनेंशियल ईयर के बाद से भारतीय EV बिक्री में 14 गुना बढ़ोतरी के बावजूद, सेमीकंडक्टर और रेयर-अर्थ मैग्नेट जैसी महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी के लिए घरेलू सप्लाई चेन अविकसित है और इंपोर्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।
लागत और मानकीकरण का जाल
रिपोर्ट स्पष्ट रूप से असेंबली और वास्तविक वैल्यू क्रिएशन के बीच एक बड़ा अंतर दिखाती है। कई भारतीय मूल उपकरण निर्माता (OEMs) चेसिस और सस्पेंशन सिस्टम जैसे मैकेनिकल और स्ट्रक्चरल कंपोनेंट्स का स्थानीयकरण करने में सफल रहे हैं। लेकिन, ट्रैक्शन मोटर, मोटर कंट्रोलर और व्हीकल कंट्रोल यूनिट जैसे हाई-वैल्यू सिस्टम अभी भी बड़े पैमाने पर इंपोर्ट किए जाते हैं। भारतीय निर्माता अक्सर अनोखे, गैर-मानकीकृत डिज़ाइन का उपयोग करते हैं, जिस वजह से वे उस इकोनॉमी ऑफ स्केल (Economies of Scale) को हासिल नहीं कर पाते जिसका फायदा चीनी निर्माता उठाते हैं। इस बिखराव के कारण इंडस्ट्री प्रति-यूनिट लागत कम करने में संघर्ष करती है, जिससे स्थानीय सप्लायर्स के लिए ग्लोबल हब के मुकाबले कीमत पर टिकना मुश्किल हो जाता है।
सरकारी इंसेंटिव्स की भूमिका
भारत ने घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऑटोमोटिव सेक्टर के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम शुरू की है। हालांकि, IEEFA और JMK रिपोर्ट से पता चलता है कि 2026 की शुरुआत तक, आवंटित ₹25,938 करोड़ का 10% से भी कम भुगतान किया गया था। इस धीमी रफ्तार से संकेत मिलता है कि कई निर्माता अभी तक अपनी स्थानीय विनिर्माण क्षमताओं को उस स्तर तक नहीं बढ़ा पाए हैं जहां वे इन इंसेंटिव्स का लाभ उठा सकें। निवेशकों के लिए, इन फंडों के वितरण और उपयोग की गति सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि घरेलू सप्लाई चेन कितनी तेज़ी से परिपक्व हो रही है।
इंपोर्ट की बाधा
इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी पर निर्भरता सिर्फ लागत की समस्या नहीं है; यह सप्लाई चेन को कमज़ोर भी बनाती है। सेमीकंडक्टर, जो पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के 'ब्रेन' के रूप में काम करते हैं, और रेयर-अर्थ मैग्नेट, जो हाई-एफिशिएंसी मोटर्स के लिए महत्वपूर्ण हैं, चीन और ताइवान जैसे वैश्विक बाजारों में केंद्रित हैं। जबकि भारतीय ऑटोमोटिव इंडस्ट्री अपनी वैल्यू चेन को इलेक्ट्रॉनिक्स की ओर बढ़ा रही है, इन विशिष्ट कंपोनेंट्स के लिए स्वदेशी क्षमता की कमी का मतलब है कि EV की लागत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अंतर्राष्ट्रीय सप्लाई मार्केट से जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में घरेलू सफलताओं के बिना, देश के भीतर डीप वैल्यू क्रिएशन सीमित रह सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
EV सेक्टर की निगरानी करने वाले निवेशकों को केवल बिक्री वृद्धि के आंकड़ों से आगे देखना चाहिए। मुख्य रूप से पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और मोटर्स जैसी हाई-वैल्यू टेक्नोलॉजी के लिए कंपोनेंट लोकलाइजेशन की गति पर नज़र रखनी होगी। इसके अतिरिक्त, PLI स्कीम फंड के वितरण को ट्रैक करने से यह जानकारी मिलेगी कि निर्माता साधारण असेंबली से गहरे घरेलू विनिर्माण की ओर सफलतापूर्वक बढ़ रहे हैं या नहीं। इंडस्ट्री-वाइड कंपोनेंट मानकीकरण में प्रगति, जिससे विभिन्न ब्रांडों में सामान्य पुर्जों का उपयोग संभव होगा, यह निर्धारित करने में भी एक महत्वपूर्ण कारक होगा कि क्या भारतीय EV निर्माता अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के साथ लागत के अंतर को पाट सकते हैं।
