ऊंची कीमतें सबसे बड़ा रोड़ा
इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की धीमी ग्रोथ की सबसे बड़ी वजह इनकी ऊंची कीमत है। उदाहरण के तौर पर, एक आम पेट्रोल कार Hyundai Creta की कीमत करीब ₹12.8 लाख है, वहीं डीजल मॉडल ₹15 लाख तक जाता है। इसके मुकाबले, इसी का इलेक्ट्रिक वेरिएंट खरीदने के लिए ग्राहकों को करीब ₹19.5 लाख तक खर्च करने पड़ सकते हैं। खरीद के समय ₹7 लाख का यह बड़ा अंतर भारतीय खरीदार को तुरंत आकर्षित नहीं कर पाता, भले ही लंबे समय में रनिंग कॉस्ट कम हो।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 29,000 से ज़्यादा पब्लिक चार्जिंग स्टेशन हैं, जिनमें 8,800 फास्ट चार्जर शामिल हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे काफी अलग है। कर्नाटक में, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सभी 31 जिलों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने का प्लान था, लेकिन प्राइवेट ऑपरेटर्स ने केवल नौ जिलों में ही दिलचस्पी दिखाई। इसकी वजह EV की कम डेंसिटी और कमाई की संभावनाओं को लेकर चिंता थी। इस तरह के निवेश शहरी इलाकों में सिमट कर रह जाते हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में चार्जिंग की दिक्कतें बढ़ जाती हैं और 'रेंज एंग्जायटी' (Range Anxiety) बनी रहती है।
सप्लाई चेन पर निर्भरता
भारत की EV महत्वाकांक्षाओं को बैटरी के लिए ज़रूरी लिथियम जैसे महत्वपूर्ण मटेरियल के आयात पर भारी निर्भरता भी सीमित कर रही है। देश में लिथियम-आयन बैटरियों की मांग काफी हद तक विदेश से पूरी होती है, जिससे ग्लोबल सप्लाई में रुकावटों का खतरा बना रहता है। हाल ही में चीन द्वारा बैटरी कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट पर लगाए गए प्रतिबंधों ने इस कमजोरी को उजागर किया है, जो भारत की क्लीन मोबिलिटी की राह में एक बड़ा जोखिम है।
नीतिगत अनिश्चितता
FAME स्कीम और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLI) जैसी सरकारी स्कीमें घरेलू EV इकोसिस्टम बनाने की मजबूत मंशा दिखाती हैं। हालांकि, टारगेट और इंसेंटिव्स में बार-बार होने वाले बदलावों से निवेश के माहौल में अनिश्चितता बनी रहती है। मैन्युफैक्चरर्स और सप्लायर्स को लगातार बदलते नियमों के बीच काम करना पड़ता है, जिससे लॉन्ग-टर्म प्लानिंग और निवेश के फैसले प्रभावित होते हैं।
