इलेक्ट्रिक व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम पर भारत को लगा झटका! विदेशी कंपनियां ट्रेड डील को दे रहीं तरजीह

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
इलेक्ट्रिक व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम पर भारत को लगा झटका! विदेशी कंपनियां ट्रेड डील को दे रहीं तरजीह

भारत सरकार की इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बनाने की स्कीम को अब तक किसी भी ग्लोबल ऑटोमेकर ने नहीं अपनाया है। कंपनियां यूके (UK) और यूरोपीय संघ (EU) के साथ हुए नए ट्रेड एग्रीमेंट्स के कारण इंपोर्ट (Import) को ज्यादा फायदेमंद मान रही हैं। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि घरेलू कार कंपनियों को भविष्य में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।

क्यों ग्लोबल ऑटो मेकर्स नहीं ले रहे स्कीम का फायदा?

भारत सरकार की 'Scheme to Promote Manufacturing of Electric Passenger Cars in India' (SPMEPCI), जिसे जून 2025 में लॉन्च किया गया था, अगस्त 2026 तक किसी भी विदेशी ऑटोमेकर को आकर्षित करने में नाकाम रही है। इस स्कीम का मकसद विदेशी कंपनियों को इंसेंटिव (Incentives) देकर भारत में लोकल प्रोडक्शन (Local Production) के लिए प्रोत्साहित करना था, लेकिन ऑटो इंडस्ट्री की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

इसकी मुख्य वजह इंटरनेशनल ट्रेड (International Trade) के बदलते हालात हैं। ग्लोबल कार मेकर्स भारी इन्वेस्टमेंट करके लोकल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट (Local Manufacturing Plant) लगाने के बजाय, हाल ही में साइन हुए ट्रेड एग्रीमेंट्स (Trade Agreements) का फायदा उठाने का इंतजार कर रहे हैं। जुलाई 2026 में लागू हुए इंडिया-यूके कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) और इस साल की शुरुआत में फाइनल हुए इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (India-EU Free Trade Agreement) के तहत कारों पर इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) कम करने का रास्ता साफ हो गया है।

कई ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स के लिए, ये ट्रेड डील्स भारतीय मार्केट में एंट्री का एक आसान तरीका हैं। कम टैक्स रेट पर व्हीकल्स (Vehicles) इंपोर्ट करके, कंपनियां लोकल फैक्ट्री लगाने के भारी भरकम खर्चे के बिना कंज्यूमर की डिमांड (Consumer Demand) का अंदाजा लगा सकती हैं। इस स्ट्रैटेजी (Strategy) से SPMEPCI की जरूरत ही खत्म हो जाती है, जिसमें स्कीम का फायदा उठाने के लिए बड़े लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट (Long-term Investment) की जरूरत होती है।

घरेलू कंपनियों पर असर

इस बदलाव से Tata Motors और Mahindra & Mahindra जैसी बड़ी भारतीय ऑटो कंपनियों के लिए एक नई सिचुएशन (Situation) खड़ी हो गई है। सालों से, डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स (Domestic Manufacturers) को हाई इंपोर्ट ड्यूटी का फायदा मिलता रहा है, जिससे वे महंगी ग्लोबल ब्रांड्स से सीधे मुकाबले से बचे हुए थे। जैसे-जैसे इन ट्रेड पैक्ट्स (Trade Pacts) के तहत इंपोर्टेड व्हीकल्स पर टैरिफ (Tariff) कम होने लगेगा, खासकर प्रीमियम और लग्जरी (Luxury) EV सेगमेंट्स में, कॉम्पिटिशन (Competition) के बढ़ने की उम्मीद है।

अगर ग्लोबल ब्रांड्स कम कीमतों पर हाई-एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (Electric Vehicles) ला पाते हैं, तो यह डोमेस्टिक कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर दबाव डाल सकता है, जो फिलहाल अपनी प्रीमियम EV लाइनअप को बढ़ा रही हैं। इन्वेस्टर्स (Investors) इस बात पर नजर रख रहे हैं कि क्या डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स अपनी मार्केट शेयर (Market Share) बनाए रख पाएंगे या उन्हें इंटरनेशनल मॉडल्स (International Models) के मुकाबले के लिए अपने प्रोडक्ट डेवलपमेंट (Product Development) में तेजी लानी होगी।

पॉलिसी का भविष्य

मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिए किसी भी एप्लीकेंट (Applicant) का न होना सरकार को अपनी स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर सकता है। पॉलिसी मेकर्स (Policy Makers) या तो SPMEPCI की इन्वेस्टमेंट रिक्वायरमेंट्स (Investment Requirements) को आसान बनाने या लोकल प्रोडक्शन को इंपोर्ट की तुलना में ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए दूसरे तरह के सपोर्ट (Support) लाने पर विचार कर सकते हैं। इन्वेस्टर्स के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स की दिलचस्पी वापस पाने के लिए स्कीम में बदलाव करती है या फिर ट्रेड एग्रीमेंट्स के कॉम्पिटिटिव इम्पैक्ट (Competitive Impact) को मैनेज करने पर पूरा ध्यान शिफ्ट होता है। यह देखना बाकी है कि ये कम टैरिफ व्हीकल की कीमतों को जमीन पर कितना प्रभावित करेंगे, जो ऑटो सेक्टर के लिए एक अहम फैक्टर है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.