भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग स्टेशनों की संख्या साल 2022 के मुकाबले करीब 6 गुना बढ़कर 30,000 के करीब पहुंच गई है। हालांकि, इनका इस्तेमाल (utilization) अभी भी मात्र 1% से 5% के बीच अटका हुआ है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर की ग्रोथ और रेवेन्यू के बीच बड़ा गैप पैदा हो गया है।
ग्रोथ और डिमांड में बेमेल (Mismatch)
चार्जिंग स्टेशन लगाने वाली कंपनियों (CPOs) के सामने सबसे बड़ी समस्या लोकेशन की है। चार्जिंग नेटवर्क का बड़ा हिस्सा शहरों और औद्योगिक हब में सिमटा हुआ है। डेटा के मुताबिक, कर्नाटक और महाराष्ट्र में ही देश का करीब 35% चार्जिंग नेटवर्क मौजूद है, जबकि ग्रामीण और इंटरसिटी इलाकों में भारी कमी है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की तुलना में पैसेंजर कारों की चार्जिंग डिमांड अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है, जिससे ये स्टेशन व्यस्त रह सकें। खाली पड़े स्टेशनों की वजह से इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस की लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
ऑपरेटरों पर बढ़ता आर्थिक दबाव
इस सेक्टर का बिजनेस मॉडल फिलहाल एक सख्त कॉस्ट स्ट्रक्चर में फंसा है। राज्यों के हिसाब से बिजली की दरें ₹6 से ₹15 प्रति यूनिट तक हैं। जमीन का किराया और ग्रिड मेंटेनेंस की लागत मिलकर कंपनियों के मार्जिन को निचोड़ रहे हैं। समस्या तब और बढ़ जाती है जब 200 से ज्यादा कंपनियां बाजार में एक ही प्राइम लोकेशन पर चार्जिंग स्टेशन लगाने की होड़ करती हैं, जिससे मार्केट काफी बिखरा हुआ (Fragmented) हो गया है।
सरकार का सपोर्ट और भविष्य की राह
सरकार PM E-DRIVE योजना के तहत ₹10,900 करोड़ से ज्यादा का बजट आवंटित कर सेक्टर को सहारा दे रही है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए तो ठीक है, लेकिन कम उपयोग (Low Usage) की बुनियादी समस्या को हल करने के लिए डेटा-आधारित साइट सिलेक्शन की जरूरत है। निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये कंपनियां केवल संख्या बढ़ाने के बजाय हाई-ट्रैफिक रूट और फ्लीट डिमांड पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगी, ताकि लंबे समय में अपना मुनाफे का लक्ष्य हासिल कर सकें।
