यह EV की ओर बड़ा कदम भारत की औद्योगिक रणनीति को पूरी तरह बदल रहा है। इसका मकसद सिर्फ पुरानी गाड़ियों को अपग्रेड करना नहीं, बल्कि बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर जैसे भविष्य के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में छलांग लगाना है।
उत्सर्जन से आगे, औद्योगिक दबदबा
अमिताभ कांत ने साफ कहा है कि हाइब्रिड जैसी इंटरमीडिएट टेक्नोलॉजी (intermediate technology) पुरानी 'टाइपराइटर' जैसी हैं। उन्होंने चेताया कि ऐसे में भारत पुरानी टेक्नोलॉजी में फंस सकता है, जबकि बाकी दुनिया फुल-इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर बढ़ रही है। यह परिवर्तन भारत के आठ गुना GDP बढ़ाने और सोलह गुना मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट बढ़ाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए बेहद जरूरी है। इसमें बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे नए डोमेन में वैल्यू बढ़ाना शामिल है, न कि पुरानी ऑटोमोटिव तकनीकों से मिलने वाले घटते मुनाफे से चिपके रहना।
पॉलिसी का जोर और आर्थिक उम्मीदें
केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री H.D. कुमारस्वामी ने पुष्टि की है कि भारत का EV मिशन एक अहम दौर में प्रवेश कर चुका है, जो 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के अनुरूप है। सरकार की ओर से PM E-DRIVE स्कीम के तहत 28 लाख से अधिक EVs को मदद दी गई है और शहरों के लिए 14,000 से ज्यादा इलेक्ट्रिक बसें मंजूर की गई हैं। इसके साथ ही, एडवांस्ड बैटरी सेल और ऑटोमोबाइल के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत कर रही है। क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग और रेयर अर्थ मैग्नेट (rare earth magnet) के उत्पादन में भी क्षमताएं विकसित की जा रही हैं, जो लंबी अवधि की प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय ऑटो सेक्टर, जिसका मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग $150 बिलियन है, ने पिछले साल अपने प्रमुख इंडेक्सों में 20-30% का शानदार रिटर्न दिया है। यह घरेलू मांग और सरकारी नीतियों का नतीजा है। लिस्टेड कंपनियों के लिए P/E रेश्यो आमतौर पर 20x से 35x के बीच हैं, जो मजबूत भविष्य की उम्मीदें दर्शाते हैं। 2025 में इस सेक्टर में 8-10% की वृद्धि का अनुमान है, जिसमें EV ही मुख्य इंजन होंगे।
निर्यात क्षमता और वैश्विक बदलाव
यह EV की ओर झुकाव सिर्फ घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। FICCI-Yes Bank की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत खुद को एक महत्वपूर्ण EV एक्सपोर्ट हब बनाने की ओर बढ़ रहा है। यह वैश्विक ऑटो सप्लाई चेन के EV प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द हो रहे बदलाव का फायदा उठाएगा। वैश्विक EV बिक्री में सालाना लगभग 30% की वृद्धि का अनुमान है, और भारत इस बढ़त का फायदा उठाने की जुगत में है, जबकि हाइब्रिड बिक्री को भी अंततः मुख्य बाजारों में बंद कर दिया जाएगा।
वैल्यूएशन और सेक्टर का हाल
वित्तीय वर्ष 24 (FY24) में भारत का EV पेनिट्रेशन (EV penetration) लगभग 6% है, खासकर पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में, और यह तेजी से बढ़ रहा है। भारत इस मामले में कई उभरते बाजारों से बेहतर स्थिति में है। हालांकि, 20,000 से अधिक पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों के बावजूद, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार, ग्रिड की क्षमता और मानकीकरण (standardization) जैसे मुद्दे EV की सतत वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
चुनौतियाँ और खतरे
इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, कुछ बड़ी बाधाएं भी हैं। बैटरी मैन्युफैक्चरिंग के लिए कच्चे माल पर देश की निर्भरता एक प्रमुख चिंता है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार में लॉजिस्टिक्स और ग्रिड इंटीग्रेशन (grid integration) की चुनौतियाँ खरीदारों को धीमा कर सकती हैं। साथ ही, क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग और रेयर अर्थ मैग्नेट उत्पादन में सरकार की सफलता अभी पूरी तरह साबित होनी बाकी है, जिससे भारतीय EV मैन्युफैक्चरिंग की लंबी अवधि की प्रतिस्पर्धात्मकता पर सवाल उठ सकते हैं। बड़े ग्लोबल ऑटो दिग्गजों से कड़ी प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ी चुनौती है, जो भारत की बाजार हिस्सेदारी को सीमित कर सकती है।
भविष्य की दिशा और बाजार की उम्मीदें
आगे का रास्ता भारत के ऑटो सेक्टर के लिए EV में उसकी सफलता से जुड़ा है। सरकारी इरादे, बदलती नीतियां और प्राइवेट सेक्टर के निवेश के साथ, भारत घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ EV मैन्युफैक्चरिंग में एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बनने की ओर बढ़ रहा है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि जो कंपनियाँ तकनीकी बदलावों और सप्लाई चेन की जटिलताओं को प्रभावी ढंग से भुना पाएंगी, वे इस इलेक्ट्रिक युग में भारत को मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।