भारत में E100 इथेनॉल फ्यूल को अपनाने की राह मुश्किल हो गई है। गाड़ियों की भारी कीमत और बहुत कम फ्यूल बचत ग्राहकों को लुभा नहीं पा रही है। ऐसे में, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का भविष्य सवालों के घेरे में है, जिसे निवेशकों को समझना होगा।
क्या है माजरा?
भारत का E100 फ्यूल (100% इथेनॉल वाला फ्यूल) को बढ़ावा देने का बड़ा प्लान अब मुश्किलों में पड़ता दिख रहा है। इंडस्ट्री की हालिया रिपोर्ट बता रही हैं कि फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां (FFVs) आम भारतीय ग्राहक के लिए फिलहाल किफायती साबित नहीं हो रही हैं। सरकार और कार कंपनियों की कोशिशों के बावजूद, गाड़ियों की शुरुआती कीमत ज्यादा होना और चलाने में बहुत कम बचत होना, इसके बड़े पैमाने पर अपनाने में बड़ी रुकावट बन रहा है।
पैसों का गणित क्या कहता है?
गाड़ी खरीदने वाले के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि शुरुआत में कितनी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी और फ्यूल बचाने में कितना समय लगेगा। मौजूदा आंकड़े इस मामले में चिंताजनक हैं। फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां, जैसे कि WagonR, पेट्रोल मॉडल के मुकाबले ₹86,000 से ज्यादा महंगी हैं।
अगर E85 फ्यूल की मौजूदा कीमत ₹82.12 प्रति लीटर है, तो पेट्रोल के मुकाबले हर किलोमीटर पर बचत सिर्फ 8 पैसे की है। इस हिसाब से, एक ग्राहक सालाना लगभग ₹1,100 ही बचा पाएगा। ऐसे में, गाड़ी पर लगे अतिरिक्त पैसे वसूलने में ग्राहक को बहुत लंबा समय लग जाएगा, जो कि कीमत के प्रति संवेदनशील खरीदारों के लिए आकर्षक नहीं है। अगर E100 फ्यूल ₹65 प्रति लीटर के हिसाब से भी मिले, तो भी ग्राहक को ब्रेक-इवन (लागत वसूलने) में करीब 5 साल लगेंगे।
ऑटो कंपनियों के लिए क्यों है यह अहम?
Maruti Suzuki और Toyota Kirloskar Motor जैसी बड़ी ऑटो कंपनियों के लिए ग्राहकों की यह हिचकिचाहट एक बड़ा फैक्टर है। फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां बनाने में कंपनियों को रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। इसमें इंजन, फ्यूल सिस्टम और इथेनॉल की ক্ষয়কারী (corrosive) प्रकृति को झेलने वाले मटीरियल में बदलाव शामिल हैं।
अगर फाइनल प्रोडक्ट ग्राहक को सीधा आर्थिक फायदा नहीं पहुंचा पाता है, तो मांग कम ही रहेगी। इससे इनवेस्टमेंट्स के बिजनेस केस पर दबाव आता है। ब्राजील जैसे देशों के विपरीत, जहां सरकारी नीतियों और लगातार फ्यूल प्राइसिंग ने FFVs को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, वहीं भारतीय बाजार फिलहाल दूसरे विकल्पों, खासकर कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) को ज्यादा पसंद कर रहा है, क्योंकि CNG चलाने में काफी सस्ती है और खरीदारों के लिए पैसे जल्दी वसूल हो जाते हैं। यह मुकाबला E100 के लिए बाजार की जगह को सीमित करता है।
तकनीकी और ऑपरेशनल जोखिम
सिर्फ फ्यूल की कीमत ही नहीं, इस बदलाव में ऑपरेशनल चुनौतियां भी बहुत हैं। कार कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि गाड़ियां लंबे समय तक चलें, क्योंकि इथेनॉल गाड़ियों के पुर्जों को नुकसान पहुंचा सकता है। लगातार टेस्टिंग और कई व्हीकल प्लेटफॉर्म्स का वैलिडेशन, डेवलपमेंट के खर्च को और बढ़ा देता है। अगर कीमत के दबाव के कारण यह खर्च ग्राहक पर नहीं डाला जा सका, तो कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
ऑटो सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए E100 को अपनाना सीधा रास्ता नहीं है। सबसे अहम बात सरकारी नीतियां होंगी, जैसे कि क्या FFVs की शुरुआती कीमत कम करने के लिए टैक्स छूट या सब्सिडी दी जाएगी, या पेट्रोल और इथेनॉल की कीमतों के बीच बड़ा अंतर पैदा करने वाली फ्यूल प्राइसिंग नीतियां लाई जाएंगी।
निवेशकों को बड़ी ऑटो कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर भी ध्यान देना चाहिए। असल मार्केट रिस्पॉन्स, टेस्ट रीजन्स में ग्राहकों की प्रतिक्रिया और फ्यूल सप्लाई इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार की जानकारी यह समझने में मददगार होगी कि E100 लंबे समय की पॉलिसी का हिस्सा बना रहेगा या लिस्टेड कंपनियों के लिए एक कमर्शियली वायबल सेगमेंट बन पाएगा।
