ऑपरेशनल दिक्कतों ने धीमी की ई-बस डिस्पैच की रफ्तार
2026 के पहले चार महीनों में भारत में इलेक्ट्रिक बसों की बिक्री (Registrations) में साल-दर-साल (19%) का इजाफा हुआ, जो कुल मिलाकर करीब 1,868 यूनिट्स तक पहुंच गई। हालांकि, यह ग्रोथ स्थिर नहीं रही, क्योंकि मार्च के मुकाबले अप्रैल में डिस्पैच (Dispatches) में 37% की भारी गिरावट देखी गई। यह कमी मांग की कमी के कारण नहीं, बल्कि चार्जिंग और डिपो जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) सुविधाओं की तैयारी से जुड़ी जटिल एक्जीक्यूशन साइकिल्स (Execution Cycles) के कारण आई है। अब मार्केट का फोकस सिर्फ टेंडर (Tender) जीतने से हटकर, फ्लीट (Fleet) को बड़े पैमाने पर ऑपरेट करने और चार्ज करने की क्षमता साबित करने पर है। JSW Greentech जैसी नई कंपनियां और PMI Electro Mobility, JBM Auto, Switch Mobility जैसे पुराने प्लेयर्स इन ऑपरेशनल हकीकतों से निपट रहे हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि असली तस्वीर समझने के लिए तीन से छह महीने का नजरिया रखना होगा।
मार्केट कंसॉलिडेशन और मुख्य खिलाड़ी
मार्केट में कंसॉलिडेशन (Market Consolidation) देखने को मिल रहा है, जिसमें PMI Electro Mobility, Olectra Greentech और Switch Mobility हाल के आंकड़ों में आगे हैं। PMI ने H1 2025 और CY2025 में सबसे ज्यादा रजिस्ट्रेशन दर्ज किए, जबकि Switch Mobility ने FY26 में सबसे ज्यादा 1,166 यूनिट्स बेचीं। दूसरी ओर, Tata Motors के इलेक्ट्रिक बस रजिस्ट्रेशन में CY2025 में 84% की भारी गिरावट आई, जो मार्केट शेयर में बड़ी हिस्सेदारी खोने का संकेत देता है। सरकारी नीतियां, जैसे PM E-DRIVE और PM e-Bus Sewa, इस सेक्टर के लिए अहम ड्राइवर हैं, जिनका लक्ष्य 2030 तक 40% बसों को इलेक्ट्रिक बनाना है। कॉस्ट सेविंग और सब्सिडिज के चलते बैटरी इलेक्ट्रिक बसें (BEBs) 65% से ज्यादा मार्केट शेयर के साथ लीड कर रही हैं, जिनमें LFP लिथियम-आयन बैटरीज का इस्तेमाल आम है।
नई कंपनी JSW Greentech का बड़े पैमाने पर निवेश
वहीं, नई कंपनी JSW Greentech महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक बड़ी ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी (Manufacturing Facility) लगा रही है। इसका लक्ष्य सालाना 10,000 इलेक्ट्रिक बसों और 5,000 इलेक्ट्रिक ट्रकों की कैपेसिटी तैयार करना है। जुलाई 2027 तक शुरू होने वाली इस बड़ी, कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-Intensive) प्रोजेक्ट से JSW की मार्केट में लंबी अवधि की महत्वाकांक्षाएं जाहिर होती हैं। एनालिस्ट्स उम्मीद कर रहे हैं कि 2026 के अंत तक इसके प्रोडक्शन का असर कमर्शियल डिस्पैच पर दिखने लगेगा।
लगातार बनी हुई हैं चुनौतियां
ग्रोथ के बावजूद, इलेक्ट्रिक बस सेगमेंट अभी भी शुरुआती दौर में है, जो FY25 में कुल बस रजिस्ट्रेशन का सिर्फ 4% है। सरकारी खरीद पर निर्भरता इसे पॉलिसी बदलावों और फंड की कमी के प्रति संवेदनशील बनाती है। सबसे बड़ी दिक्कत चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का EV एडॉप्शन से पीछे रह जाना है, जिससे रेंज की चिंता (Range Anxiety) और ऑपरेशनल समस्याएं बढ़ रही हैं। चार्जिंग स्टेशन के लिए जमीन हासिल करना, ग्रिड की तैयारी सुनिश्चित करना और ऑपरेटर्स के लिए हाई इलेक्ट्रिसिटी टैरिफ जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। कड़ी प्रतिस्पर्धा और इंटीग्रेटेड ऑपरेशंस की ओर बढ़ना मैन्युफैक्चरिंग से परे, चार्जिंग और डिपो मैनेजमेंट में भारी निवेश की मांग करता है। Tata Motors के मार्केट शेयर में आई भारी गिरावट इस बात को रेखांकित करती है कि जो कंपनियां इन बदलती ऑपरेशनल मांगों के अनुकूल नहीं ढल पातीं, उन्हें कितना बड़ा जोखिम उठाना पड़ सकता है।
भविष्य इंटीग्रेटेड सॉल्यूशंस पर निर्भर
भारत के इलेक्ट्रिक बस मार्केट का आउटलुक (Outlook) मजबूत बना हुआ है, जिसमें 2030 तक 18-23% CAGR की ग्रोथ का अनुमान है। यह भारतीय इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल मार्केट के 2034 तक 44.5 बिलियन USD तक पहुंचने के अनुमानों से भी समर्थित है। भविष्य में मैन्युफैक्चरर्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे ग्राहकों की टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO) और विश्वसनीयता (Reliability) की मांग को पूरा करने के लिए इंटीग्रेटेड चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और गारंटीड ऑपरेशनल अपटाइम जैसे कॉम्प्रिहेंसिव सॉल्यूशंस (Comprehensive Solutions) कैसे पेश करते हैं। PM E-DRIVE फेज I के तहत आवंटित 10,900 से अधिक बसों जैसे बड़े टेंडर प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका प्रभावी डिप्लॉयमेंट मौजूदा ऑपरेशनल और इंफ्रास्ट्रक्चर की बाधाओं को दूर करने पर ही टिका है।
