भारतीय कार खरीदार अब फ्यूल एफिशिएंसी और मंथली EMI से आगे बढ़कर 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' (Total Cost of Ownership) यानी गाड़ी की कुल लागत पर ध्यान दे रहे हैं। जुलाई 2026 तक, CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक गाड़ियों ने रिटेल बिक्री में लगभग **41%** का बड़ा हिस्सा ले लिया है, जबकि पेट्रोल कारों की मांग रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गई है। यह बड़ा बदलाव बताता है कि ऑटोमेकर्स को अब अपनी मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए अलग-अलग पावरट्रेन पर ध्यान देना होगा।
खरीदने की सोच बदली, 'कितना देती है' की जगह अब 'कितना पड़ेगा'
भारतीय पैसेंजर व्हीकल मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक, कार खरीदते समय लोग सबसे पहले फ्यूल एफिशिएंसी यानी 'कितना देती है' और मंथली EMI पर ध्यान देते थे। लेकिन जुलाई 2026 के आंकड़े बताते हैं कि यह सोच बदल चुकी है। अब CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक गाड़ियां (Alternative Powertrains) रिटेल मार्केट का 40.59% हिस्सा बटोर चुकी हैं।
पेट्रोल कारों का शेयर रिकॉर्ड लो पर
वहीं, पेट्रोल कारों का मार्केट शेयर गिरकर रिकॉर्ड 41.68% पर आ गया है। यानी, पारंपरिक पेट्रोल कारें और वैकल्पिक फ्यूल वाली गाड़ियों के बीच मार्केट शेयर का अंतर घटकर सिर्फ 1.09% रह गया है। एक साल पहले यह अंतर 13.21% था, जो इस बड़े बदलाव को साफ दिखाता है।
टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO) का बढ़ता महत्व
ग्राहक अब सिर्फ कार की शुरुआती कीमत नहीं, बल्कि उसे चलाने, मेंटेनेंस, इंश्योरेंस और रीसेल वैल्यू को मिलाकर पड़ने वाली कुल लागत (Total Cost of Ownership - TCO) का हिसाब लगा रहे हैं। नई कारों की बढ़ती कीमतें, कड़े एमिशन नॉर्म्स और सेफ्टी फीचर्स के कारण यह बदलाव आया है।
E20 फ्यूल को लेकर चिंताएं
इसके अलावा, E20 (20% इथेनॉल-मिश्रित) फ्यूल को लेकर भी ग्राहकों में कुछ चिंताएं हैं। उन्हें डर है कि इससे इंजन की हेल्थ पर असर पड़ सकता है या एफिशिएंसी कम हो सकती है। इस वजह से, कई ग्राहक CNG और हाइब्रिड जैसे विकल्पों को ज्यादा भरोसेमंद मान रहे हैं।
यूज्ड कार मार्केट का सहारा
नई कारें महंगी होने की वजह से, पुरानी (Used) कारों का मार्केट भी काफी मजबूत हुआ है। यह मार्केट नई कारों के मार्केट से 1.39 गुना बड़ा है और सालाना 11-13% की दर से बढ़ रहा है। अच्छी पारदर्शिता और आसान फाइनेंसिंग (जिसका पैठ पिछले 5 सालों में दोगुना होकर 32% हो गया है) के कारण, यह सेगमेंट उन खरीदारों के लिए एक बेहतर विकल्प बन गया है जो बजट में अच्छी कार चाहते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह बदलाव निवेशकों के लिए भी अहम है। जिन ऑटोमेकर्स की कमाई किसी एक पावरट्रेन पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है, उन्हें भविष्य में दिक्कतें आ सकती हैं। EV सेगमेंट बढ़ रहा है, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी हेल्थ जैसी चुनौतियां अभी भी हैं। E20 फ्यूल का इंजन पर लॉन्ग-टर्म असर क्या होगा, इस पर भी नजर रखनी होगी।
