टेक्नोलॉजी अपग्रेड में लगेगा भारी पैसा
नई CAFE III गाइडलाइंस के तहत, कार निर्माताओं को अपनी गाड़ियों में शुरुआती दौर में ही Idle Start-Stop सिस्टम, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग, लो रोलिंग रेसिस्टेंस टायर और इंजन ऑप्टिमाइजेशन जैसी तकनीकें लगानी होंगी। इससे प्रति गाड़ी ₹20,000 से ₹35,000 का अतिरिक्त खर्च आएगा। फाइनेंशियल ईयर 2030 तक, गाड़ी के डिजाइन में सुधार (aerodynamics) और हल्के मटेरियल (lightweight materials) के इस्तेमाल से यह लागत और बढ़ेगी। फाइनेंशियल ईयर 2032 तक, 48V माइल्ड-हाइब्रिड सिस्टम और बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिफिकेशन को अपनाना अनिवार्य हो जाएगा, जिससे हर गाड़ी पर कुल लागत बढ़कर ₹85,000 से ₹1.25 लाख तक पहुंच सकती है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का मार्केट शेयर फाइनेंशियल ईयर 2028 के लगभग 9-10% से बढ़कर फाइनेंशियल ईयर 2032 तक 17-19% हो जाने की उम्मीद है।
कंपनियों के लिए अलग-अलग चुनौतियाँ
यह नए नियम विभिन्न निर्माताओं के लिए अलग-अलग मुश्किलें खड़ी करेंगे। Tata Motors, जो पहले से ही EV सेगमेंट में मजबूत है, अच्छी स्थिति में दिख रही है। Maruti Suzuki भी अपने वर्तमान वाहन मिश्रण (vehicle mix) के कारण इस बदलाव से कुछ हद तक लाभान्वित हो सकती है। वहीं, Hyundai जैसी कंपनियाँ, जिनकी इलेक्ट्रिफिकेशन योजनाएँ धीमी हैं, और Skoda, Volkswagen, Renault-Nissan जैसी जो अभी भी पारंपरिक पेट्रोल (ICE) इंजन पर बहुत अधिक निर्भर हैं, उन्हें अनुपालन (compliance) की कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। Mahindra & Mahindra भी अपनी EV विकास योजना के साथ इन सख्त लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना भी लगेगा, जो फाइनेंशियल ईयर 2028 में प्रति ग्राम CO2 अतिरिक्त पर ₹2,500 से शुरू होकर फाइनेंशियल ईयर 2032 तक ₹4,500 तक पहुंच जाएगा।
ग्राहकों की जेब पर असर: क्या ईंधन बचत की भरपाई होगी?
इन दक्षता (efficiency) की अनिवार्यताओं के कारण ग्राहकों को गाड़ियों की शुरुआती खरीद कीमत (purchase price) में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ेगा। हालांकि, बेहतर ईंधन दक्षता से सालाना लगभग ₹15,800 की ईंधन लागत की बचत हो सकती है, लेकिन इस लागत की भरपाई (breakeven) में लगने वाला समय तीन से बढ़कर करीब छह साल तक जा सकता है। यह खासकर एंट्री-लेवल गाड़ियों के खरीदारों के लिए सामर्थ्य (affordability) की चिंता बढ़ा सकता है।
बड़े आर्थिक प्रभाव
बड़े पैमाने पर देखें तो, बेहतर ईंधन दक्षता से फाइनेंशियल ईयर 2032 तक भारत के सालाना कच्चे तेल (crude oil) के आयात बिल में ₹60,000 करोड़ से ₹90,000 करोड़ की कमी आ सकती है। इसके अलावा, ईंधन की खपत और उत्सर्जन (emissions) के परीक्षण के लिए WLTP (Worldwide Harmonised Light Vehicles Test Procedure) मानक को अपनाने से, जो आमतौर पर वर्तमान भारतीय MIDC चक्र की तुलना में उच्च आंकड़े दिखाता है, अनुपालन और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कुल मिलाकर, CAFE III ढाँचा भारत में गाड़ियों की कीमतों, डिजाइन और बिक्री के तरीके को मौलिक रूप से बदल रहा है, जो उपभोक्ताओं और निर्माताओं दोनों को एक अधिक टिकाऊ, लेकिन अधिक महंगी, भविष्य की ओर ले जा रहा है।
