एमिशन स्टैंडर्ड्स में बड़े बदलाव की तैयारी
अप्रैल 2027 से पैसेंजर व्हीकल्स के लिए CAFE-III (Corporate Average Fuel Economy - Phase III) एमिशन स्टैंडर्ड्स लागू होने वाले हैं। इन नियमों के तहत, CO2 उत्सर्जन के लक्ष्य को और कड़ा किया जाएगा। जहाँ मौजूदा CAFE-II के तहत फ्लीट-एवरेज CO2 उत्सर्जन 113 g/km है, वहीं 2027 से 2032 के बीच इसे घटाकर 91.7 g/km करना होगा।
ग्लोबल नियमों से अलग भारत का रवैया
खास बात यह है कि भारत का यह नया नियम ग्लोबल स्टैंडर्ड्स से अलग है। दुनिया के ज़्यादातर बड़े ऑटोमोटिव मार्केट, जैसे अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में हल्के और छोटी कारों को नियमों में कुछ रियायतें दी जाती हैं। लेकिन भारत में प्रस्तावित लीनियर वेट-आधारित (linear weight-based) फॉर्मूला छोटे और हल्के वाहनों पर ज़्यादा बोझ डालेगा, क्योंकि वे आमतौर पर कम CO2 उत्सर्जित करते हैं और कम संसाधनों का उपयोग करते हैं।
कितनी बढ़ सकती हैं कार की कीमतें?
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इन नियमों के पालन में आने वाली लागत के कारण एंट्री-लेवल (entry-level) यानी सबसे सस्ती कारों की कीमतें ₹50,000 से लेकर ₹80,000 तक बढ़ सकती हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब हाल ही में GST दर में बदलाव के बाद किफायती कारों की बिक्री में सुधार देखा गया था।
इंडस्ट्री में छिड़ा नया विवाद
इस मुद्दे पर ऑटो इंडस्ट्री दो हिस्सों में बंट गई है। Maruti Suzuki और Toyota जैसी कंपनियां, जिनके पोर्टफोलियो में ज़्यादा छोटी और हल्की कारें हैं, चाहती हैं कि एमिशन टारगेट वाहनों के साइज़ के हिसाब से तय हों। उनका तर्क है कि एक समान मानक इन कंपनियों के किफायती वाहनों पर अनुचित रूप से लागत बढ़ाएंगे और व्यापक कार स्वामित्व (car ownership) को सीमित करेंगे। वहीं, Tata Motors, Hyundai और Mahindra जैसी कंपनियां एक समान (uniform) मानकों के पक्ष में हैं, जिनका मानना है कि इससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा (fair competition) बनी रहेगी।
मार्केट ट्रेंड और भविष्य की चिंताएँ
भारतीय ऑटो मार्केट में वैसे भी SUV की बढ़ती डिमांड के चलते एंट्री-लेवल हैचबैक की बिक्री पर दबाव है। यह नया नियम इस बदलाव को और तेज़ कर सकता है, जिससे आम भारतीयों के लिए प्राइवेट ट्रांसपोर्ट की पहुँच सीमित हो सकती है। SIAM (Society of Indian Automobile Manufacturers) ने चेतावनी दी है कि इन कड़े नियमों का पालन करने में अरबों रुपये के निवेश की ज़रूरत होगी, अन्यथा निर्माताओं को भारी जुर्माना देना पड़ सकता है। यह निवेश को भी हतोत्साहित कर सकता है और लंबे समय में सेक्टर के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाकर नौकरियों पर भी असर डाल सकता है।
सरकार की कोशिशें
फिलहाल, सरकार इन चिंताओं को दूर करने के लिए इंडस्ट्री के साथ मिलकर एक 'समझौते' पर काम कर रही है, ताकि पर्यावरण लक्ष्यों और ग्राहकों की किफायती गाड़ी खरीदने की ज़रूरत के बीच संतुलन बनाया जा सके।
