India Auto Sector: 2027 से बड़े नियम लागू! CAFE 3 नॉर्म्स, EV की राह आसान, बढ़ेंगी गाड़ियों की कीमतें?

AUTO
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
India Auto Sector: 2027 से बड़े नियम लागू! CAFE 3 नॉर्म्स, EV की राह आसान, बढ़ेंगी गाड़ियों की कीमतें?
Overview

भारत सरकार 2027 के अप्रैल महीने से 'कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी' (CAFE) नॉर्म्स के तीसरे चरण को लागू करने जा रही है। यह नए नियम पैसेंजर व्हीकल्स के लिए फ्यूल एफिशिएंसी के बेंचमार्क को काफी कड़ा कर देंगे, जिससे कंपनियों को इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को ज्यादा अपनाना पड़ेगा।

ऑटोमोटिव सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी: CAFE 3 नॉर्म्स का असर

भारत का ऑटोमोटिव सेक्टर एक बड़े रेगुलेटरी बदलाव के मुहाने पर खड़ा है, क्योंकि 'कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी' (CAFE) नॉर्म्स का तीसरा चरण अप्रैल 2027 से लागू होने वाला है। यह नियम मार्च 2032 तक लागू रहेंगे और कार मेकर्स के लिए क्लीनर टेक्नोलॉजीज की ओर बढ़ने का दबाव बढ़ाएंगे। इसका सीधा असर प्रोडक्ट स्ट्रेटेजी और कीमतों पर पड़ेगा।

बदलता रेगुलेटरी ढांचा

CAFE नॉर्म्स कारमेकर्स के पूरे व्हीकल फ्लीट के एवरेज कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) एमिशन को मापते हैं, जो हर साल बिक्री-भारित औसत (sales-weighted average) के आधार पर तय होता है। आने वाले CAFE 3 स्टैंडर्ड्स इन बेंचमार्क्स को और कड़ा करेंगे, जिसका लक्ष्य फ्लीट-वाइड CO₂ एमिशन को मौजूदा CAFE II लेवल, जो लगभग 113 g/km था, से घटाकर लगभग 88.4 g/km करना है।

एक अहम बदलाव यह है कि व्हीकल वेट से जुड़े एमिशन स्लोप को 0.002 से घटाकर 0.00153 किया जा रहा है। इसका मतलब है कि भारी वाहनों के लिए रेगुलेशन और सख्त हो जाएंगे, जिससे इन वाहनों के निर्माताओं को इलेक्ट्रिक पॉवरट्रेन और एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज में ज्यादा निवेश करना होगा।

इसके अलावा, सरकार छोटी कारों को मिलने वाली अतिरिक्त छूट (derogations) को बंद कर सकती है। इंडस्ट्री बॉडी SIAM का कहना है कि यह प्रस्तावित टारगेट, जिसमें 71.5g CO₂ तक की कैप शामिल हो सकती है, "अप्रत्याशित" चुनौतियां पेश करेगा और इंडस्ट्री में संकट ला सकता है। वहीं, ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) का मानना ​​है कि सख्त कैप्स जरूरी हैं, क्योंकि भारत के बड़े ऑटोमेकर्स पहले ही CAFE II टारगेट को समय से पहले पार कर चुके हैं।

नए नियमों में क्रेडिट ट्रेडिंग और फ्लीट पूलिंग जैसे कम्प्लायंस टूल्स शामिल रहेंगे। इसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) को एफिशिएंट इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) व्हीकल्स की तुलना में ज्यादा क्रेडिट मिलने की उम्मीद है। EVs के 'जीरो-एमिशन' स्टेटस को भी CAFE 3 के तहत रिकैलिब्रेट करने पर विचार किया जा रहा है, जिसके लिए एनर्जी कंजम्पशन कैलकुलेशन को ध्यान में रखा जाएगा ताकि अधिक एफिशिएंट इलेक्ट्रिक मॉडल्स को बढ़ावा मिले।

कारमेकर्स और मार्केट पर असर

सख्त CAFE 3 नॉर्म्स इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, जिसमें हाइब्रिड और बैटरी इलेक्ट्रिक मॉडल्स शामिल हैं, को अपनाने की प्रक्रिया को तेज करेंगे। कंपनियां अपने फ्लीट एवरेज को बैलेंस करने और रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट्स को पूरा करने के लिए इन टेक्नोलॉजीज की ओर बढ़ेंगी। यह रेगुलेटरी प्रेशर इंजन टेक्नोलॉजीज, लाइटवेट मैटेरियल्स और पावरट्रेन डाइवर्सिफिकेशन में इनोवेशन के लिए एक बड़ा कैटेलिस्ट साबित होगा।

प्रमुख भारतीय ऑटोमेकर्स पहले से ही इस बदलाव के लिए तैयार हो रहे हैं। मारुति सुजुकी, जो कॉम्पैक्ट कार सेगमेंट में डोमिनेंट पोजीशन रखती है, BEVs और हाइब्रिड्स सहित कई पावरट्रेन टेक्नोलॉजीज पर काम कर रही है और 2030 तक प्रोडक्शन बढ़ाने की योजना बना रही है। कंपनी का P/E रेशियो लगभग 32.10 है और मार्केट कैप लगभग ₹4.78 ट्रिलियन है।

वहीं, महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra), जो एसयूवी, एलसीवी और ट्रैक्टर सेगमेंट में एक डाइवर्सिफाइड प्लेयर है, EVs में निवेश कर रही है। कंपनी का P/E रेशियो लगभग 29.09 और मार्केट कैप करीब ₹4.33 ट्रिलियन है। टाटा मोटर्स (Tata Motors) भी EV स्पेस में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है और अपने इलेक्ट्रिक व्हीकल आर्म में भारी निवेश कर रही है।

हालांकि, खासकर छोटी और किफायती गाड़ियों के लिए बढ़ी हुई कम्प्लायंस कॉस्ट का मतलब है कि कंज्यूमर्स को ज्यादा कीमतें चुकानी पड़ सकती हैं, जिससे प्राइस-सेंसिटिव सेगमेंट में डिमांड पर असर पड़ सकता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में भारतीय पैसेंजर व्हीकल मार्केट में 4-6% की मॉडरेट वॉल्यूम ग्रोथ देखी जा सकती है।

नेगेटिव पहलू: लागत का दबाव और कम्पटीशन

CAFE 3 नॉर्म्स का मकसद सस्टेनेबल मोबिलिटी को बढ़ावा देना है, लेकिन वे बड़ी चुनौतियां भी पेश करते हैं। छोटी कारों के लिए छूट का हटना और एमिशन स्लोप का फ्लैट होना उन निर्माताओं पर ज्यादा असर डाल सकता है जो कॉम्पैक्ट, ICE-पावर्ड व्हीकल्स पर निर्भर हैं। इससे R&D और प्रोडक्शन एक्सपेंसेस बढ़ सकते हैं, जिन्हें प्राइस-सेंसिटिव मार्केट में कंज्यूमर्स पर डालना मुश्किल हो सकता है।

यह कॉस्ट प्रेशर प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकता है, जिससे मार्केट कंसॉलिडेशन या उन कंपनियों के लिए संकट पैदा हो सकता है जो नेक्स्ट-जेनरेशन टेक्नोलॉजीज में भारी निवेश करने के लिए कम तैयार हैं। EVs के 'जीरो-एमिशन' स्टेटस को लेकर नई गणनाएं जटिलता जोड़ सकती हैं, जिसके लिए एफिशिएंट एनर्जी मैनेजमेंट स्ट्रैटेजीज की जरूरत होगी।

भविष्य का दृष्टिकोण

इन रेगुलेटरी हर्डल्स के बावजूद, भारत के ऑटोमोटिव सेक्टर का लॉन्ग-टर्म आउटलुक मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, सरकार के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को सपोर्ट और बढ़ते मिडिल क्लास के कारण सकारात्मक बना हुआ है। क्लीनर मोबिलिटी की ओर ट्रांजिशन तेज होने की उम्मीद है, जिसमें EVs और हाइब्रिड व्हीकल्स की भूमिका बढ़ेगी। ऑटोमेकर्स विकसित हो रहे एफिशिएंसी स्टैंडर्ड्स को पूरा करने और उभरते बाजार के अवसरों का लाभ उठाने के लिए एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज में निवेश जारी रखेंगे। अगले दशक में, इंडस्ट्री के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो और मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटीज में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं, क्योंकि यह इन सख्त पर्यावरणीय आदेशों का सामना करेगी।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.