Indian Tyre Exports: रिकॉर्ड ₹27,312 करोड़ का पार, US टैरिफ के बावजूद इंडस्ट्री ने भरी ऊंची उड़ान!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Tyre Exports: रिकॉर्ड ₹27,312 करोड़ का पार, US टैरिफ के बावजूद इंडस्ट्री ने भरी ऊंची उड़ान!
Overview

भारतीय टायर इंडस्ट्री ने वित्तीय वर्ष 2026 में ₹27,312 करोड़ के एक्सपोर्ट के साथ एक नया रिकॉर्ड बनाया है। अमेरिकी टैरिफ में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, यूरोपीय और ब्राज़ील जैसे बाजारों पर फोकस करके कंपनियों ने यह मुकाम हासिल किया है।

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ट्रेड बैरियर्स के बीच रणनीतिक बदलाव

भारत के टायर उद्योग ने वित्तीय वर्ष 2026 में ₹27,312 करोड़ के एक्सपोर्ट वैल्यू के साथ एक रिकॉर्ड कायम किया है। यह पिछले साल की तुलना में 9% की मजबूत ग्रोथ दिखाता है। यह उपलब्धि खासकर तब और अहम हो जाती है जब अमेरिका ने भारतीय टायरों पर टैरिफ को 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया था। हालांकि, 2026 की शुरुआत में अमेरिकी प्रशासन ने इसे घटाकर 18% कर दिया, लेकिन इस अस्थिरता ने सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया और भारतीय एक्सपोर्ट को नए भौगोलिक क्षेत्रों की ओर मुड़ने पर मजबूर कर दिया।

अमेरिका से यूरोप और अन्य बाजारों की ओर झुकाव

पहले अमेरिकी बाजार भारतीय टायरों के लिए एक बड़ा ठिकाना था। लेकिन अब, अमेरिका का भारतीय एक्सपोर्ट में हिस्सा घटकर 15% रह गया है, जो पिछले वित्तीय वर्ष में 17% और FY24 में 18% था। अपने मार्जिन को बचाने और वॉल्यूम ग्रोथ बनाए रखने के लिए, भारतीय कंपनियों ने यूरोपीय संघ और उभरते बाजारों की ओर एक बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है। जर्मनी अब भारतीय टायरों के लिए दूसरा सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बन गया है, जबकि इटली, ब्राज़ील और फ्रांस से भी खरीद में काफी वृद्धि देखी गई है। इस डायवर्सिफिकेशन की रणनीति से अब भारतीय निर्माता 170 से अधिक देशों तक पहुंच पा रहे हैं, जिससे किसी एक देश पर निर्भरता काफी कम हो गई है।

कैपेक्स और मार्जिन की हकीकत

पिछले पांच सालों में, ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट्स में लगभग ₹30,000 करोड़ के भारी निवेश ने इंडस्ट्री की ग्रोथ को बनाए रखा है। हालांकि, यह विस्तार जटिल लागत दबावों के बीच हो रहा है। कच्चे माल, खासकर सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक जैसे क्रूड ऑयल डेरिवेटिव्स, जो कुल उत्पादन लागत का 60% से 70% हिस्सा हैं, उनमें महंगाई बढ़ी है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में जारी तनावों के कारण लॉजिस्टिक्स में दिक्कतें भी बढ़ी हैं। ऐसे में, कंपनियों को मार्जिन बचाने के लिए कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ रही है। JK Tyre जैसी कंपनियों ने FY26 में मजबूत डबल-डिजिट रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की है, लेकिन इंडस्ट्री के लिए ऑपरेटिंग मार्जिन को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

संभावित जोखिम

रिकॉर्ड एक्सपोर्ट के बावजूद, इंडस्ट्री में कुछ संरचनात्मक कमजोरियां बनी हुई हैं। इंपोर्टेड नेचुरल रबर पर निर्भरता, जो इंडस्ट्री की लगभग 40% जरूरतों को पूरा करता है, कंपनियों को घरेलू सप्लाई में कमी और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों के प्रतिद्वंद्वियों से भारतीय एक्सपोर्ट की प्रतिस्पर्धात्मकता खतरे में है, क्योंकि वे प्रमुख पश्चिमी बाजारों में अधिक अनुकूल ड्यूटी स्ट्रक्चर का लाभ उठा रहे हैं। निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह सेक्टर बहुत कैपिटल-इंटेंसिव है; Apollo Tyres और MRF जैसी कंपनियां भले ही मजबूत बैलेंस शीट बनाए हुए हैं, लेकिन कर्ज के सहारे क्षमता विस्तार की ऊंची लागत रिटर्न को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर वैश्विक मांग नरम पड़ती है या मौजूदा व्यापार समझौते उम्मीद के मुताबिक राहत नहीं दे पाते।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.