भारत में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर मार्केट तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है, जो वित्त वर्ष 2026 में **9.9%** के मार्केट शेयर तक पहुंच गया है। अब **43%** खरीदार अपनी अगली खरीदारी के रूप में EV को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन सब्सिडी और इंफ्रास्ट्रक्चर के बदलते नियम निवेशकों के लिए बड़ा वॉच-पॉइंट बने हुए हैं।
भारत में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर (E2W) को अपनाने की रफ्तार ने इस फाइनेंशियल ईयर में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। कुल टू-व्हीलर सेल्स में इलेक्ट्रिक मॉडल्स का हिस्सा अब 9.9% हो गया है, जो कि वित्त वर्ष 2024 के 5.5% के मुकाबले काफी ज्यादा है। डेटा के मुताबिक, हर महीने करीब 1.8 लाख खरीदार इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर अपना रहे हैं।
कंज्यूमर का बदला मूड और ग्रोथ
कंज्यूमर सेंटीमेंट में बड़ा बदलाव दिख रहा है। अब 43% संभावित खरीदार इलेक्ट्रिक मॉडल्स को चुनना चाहते हैं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 30% था। इस ग्रोथ में इलेक्ट्रिक स्कूटर सेगमेंट सबसे आगे है, जिसकी पेनिट्रेशन रेट 24.1% तक पहुंच गई है। पिछले चार सालों में इस सेगमेंट ने 54% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्ज की है।
ऑटो कंपनियों पर असर और चुनौतियां
TVS Motor Company, Bajaj Auto, Hero MotoCorp और Ola Electric जैसी कंपनियां इस ट्रांजिशन को अपनी ग्रोथ के लिए सबसे जरूरी मान रही हैं। हालांकि, इन कंपनियों का बिजनेस मॉडल काफी हद तक सरकारी पॉलिसी पर टिका है। इंडस्ट्री अब FAME-II सब्सिडी से निकलकर PM E-DRIVE स्कीम जैसे नए फ्रेमवर्क्स की तरफ बढ़ रही है। निवेशक इस बात पर बारीकी से नजर रख रहे हैं कि इन बदलावों का कंपनियों के नेट रियलाइजेशन और प्रॉफिट मार्जिन पर क्या असर होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉन्ग-टर्म रिस्क
डिमांड बढ़ने के साथ ही सेक्टर के सामने कुछ ऑपरेशनल चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने की है। इसके अलावा, बैटरी की लाइफ और अलग-अलग रास्तों पर गाड़ियों की परफॉर्मेंस को लेकर भी कंज्यूमर्स के मन में चिंताएं हैं। चूंकि इन नए मॉडल्स के लंबे समय तक उपयोग का डेटा अभी सीमित है, इसलिए कंपनियों पर अपने प्रोडक्ट्स की रिलायबिलिटी साबित करने का दबाव है। एनालिस्ट्स का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में देरी या रॉ मटेरियल की बढ़ती कीमतें इलेक्ट्रिक व्हीकल डिवीजनों के मुनाफे को प्रभावित कर सकती हैं। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां कैसे अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ाती हैं और साथ ही सरकारी नीतियों के बदलावों के बीच अपने मार्जिन को सुरक्षित रखती हैं।
