भारतीय पैसेंजर व्हीकल मार्केट के लिए दूसरी तिमाही (Q2 FY27) शानदार रही है। कुल होलसेल वॉल्यूम **30.7%** बढ़कर **1.36 मिलियन** यूनिट्स पर पहुंच गया है, हालांकि डीलर्स के पास बढ़ता स्टॉक मुनाफे के लिए रिस्क पैदा कर रहा है।
भारतीय ऑटो बाजार में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दूसरी तिमाही में कुल 1.36 मिलियन गाड़ियां डिस्पैच हुईं। बाजार का रुख अब बजट हैचबैक से हटकर प्रीमियम और फीचर-रिच कारों की ओर हो गया है। विशेष रूप से यूटिलिटी व्हीकल (UV) सेगमेंट का दबदबा बढ़ा है, जो अब कुल मार्केट का 68% हिस्सा संभाल रहा है और इसमें 34.2% की बढ़ोतरी हुई है।
प्रीमियम SUVs और फ्यूल का नया ट्रेंड
₹12-20 लाख वाली गाड़ियों के सेगमेंट में 33.6% की जबरदस्त ग्रोथ दिखी है। Maruti Suzuki जैसी कंपनियों ने भी इस दौर में 37.8% की शानदार होलसेल ग्रोथ दर्ज की है। वहीं, फ्यूल मिक्स में भी बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक पेट्रोल इंजन की हिस्सेदारी घटकर 42.6% रह गई है। इसके उलट, CNG गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन 50% बढ़कर 2.33 लाख यूनिट्स पहुंच गया, जबकि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) का आंकड़ा लगभग दोगुना होकर 97,000 यूनिट्स हो गया है।
इन्वेंट्री का बोझ बना चिंता का विषय
होलसेल आंकड़े भले ही चमक रहे हों, लेकिन डीलर्स के पास बढ़ा हुआ स्टॉक चिंता की बात है। वर्तमान में डीलर्स के पास लगभग 45 दिन का स्टॉक जमा है, जबकि आदर्श स्थिति 21 दिन की मानी जाती है। अधिक स्टॉक का मतलब है कि कंपनियों को डिस्काउंट देना पड़ सकता है, जिससे उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ेगा।
आने वाले समय में हाई बेस इफेक्ट और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण ग्रोथ की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके अलावा, 1 अप्रैल 2027 से लागू होने वाले नए CAFE-III नॉर्म्स को लेकर कंपनियां किस तरह तैयारी करती हैं, इस पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
