भारत में कार लोन की औसत राशि अब **₹8.2 लाख** के स्तर पर पहुंच गई है, जो **7** साल में **49%** का उछाल है। SUV की बढ़ती डिमांड और छोटे शहरों में क्रेडिट की भूख ने इसे हवा दी है।
भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट में फाइनेंसिंग के तौर-तरीके पूरी तरह बदल गए हैं। साल 2019 के मुकाबले कार लोन का औसत साइज अब 49% बढ़कर ₹8.2 लाख हो गया है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह प्रीमियम SUV और एडवांस फीचर्स वाली गाड़ियों के प्रति ग्राहकों की बढ़ती पसंद है। TransUnion CIBIL की रिपोर्ट के मुताबिक, यह ट्रेंड अब बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि 51% हाई-वैल्यू कार लोन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से आ रहे हैं।
NBFCs का दबदबा
क्रेडिट मार्केट में NBFCs (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां) का जलवा कायम है। पैसेंजर व्हीकल फाइनेंसिंग में NBFCs की हिस्सेदारी 37% है, जबकि टू-व्हीलर सेगमेंट में तो इनका दबदबा 73% तक पहुंच गया है। लोन राशि बढ़ने के साथ-साथ अब रीपेमेंट का समय भी बढ़ गया है, जो औसतन 62 महीने तक खिंच गया है।
क्या है रिस्क?
अच्छी बात यह है कि लोन का साइज बढ़ने के बावजूद ग्राहकों का ट्रैक रिकॉर्ड बेहतर हुआ है। 90-दिन से ज्यादा की देरी वाले लोन (Delinquency Rate) घटकर 0.5% पर आ गए हैं, जो 2019 के 1.45% के स्तर से काफी बेहतर स्थिति है।
हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अक्टूबर 2026 में RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा करते हुए इसे 5.50% कर दिया है। इससे लेंडिंग रेट्स ऊपर जा सकते हैं, जिससे भविष्य में कार लोन और महंगे होने की आशंका है। इन्वेस्टर्स अब इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि ब्याज दरों की यह बढ़ोतरी नई डिमांड को कितना धीमा करती है और बैंकों व NBFCs के मार्जिन पर कितना दबाव बनाती है।
