Indian Automakers: इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री बढ़ाने के लिए 'Battery-as-a-Service' का दांव

AUTO
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
Indian Automakers: इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री बढ़ाने के लिए 'Battery-as-a-Service' का दांव

भारतीय ऑटो कंपनियां अब 'Battery-as-a-Service' (BaaS) मॉडल अपना रही हैं ताकि ग्राहकों के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियों की शुरुआती कीमत कम की जा सके। यह रणनीति बाजार में हिस्सेदारी तो बढ़ा सकती है, लेकिन निवेशकों को इसके मार्जिन पर पड़ने वाले असर और फाइनेंसिंग की पेचीदगियों पर नजर रखनी चाहिए।

भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने के लिए ऑटो कंपनियां नई सेल्स स्ट्रैटेजी अपना रही हैं। Tata Motors, Mahindra & Mahindra और MG Motor जैसी बड़ी कंपनियों ने बैटरी को गाड़ी की कीमत से अलग (decouple) कर दिया है, जिससे ग्राहकों को गाड़ी सस्ती मिल रही है। साल 2026 की तीसरी तिमाही तक, भारत की कुल वाहन बिक्री में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी लगभग 13 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

BaaS का असली खेल क्या है?

आमतौर पर इलेक्ट्रिक गाड़ी की सबसे महंगी चीज उसकी बैटरी होती है। BaaS मॉडल में ग्राहक को बैटरी की पूरी कीमत एक साथ नहीं देनी पड़ती, बल्कि इसे एक अलग फाइनेंसिंग कॉन्ट्रैक्ट के जरिए किश्तों में चुकाया जाता है। इससे शोरूम पर गाड़ी की शुरुआती कीमत काफी कम दिखाई देती है, जिससे ये गाड़ियां पेट्रोल-डीजल वाली गाड़ियों के मुकाबले सस्ती लगने लगती हैं।

कॉम्पिटिशन और मार्जिन का रिस्क

यह कदम अब बाजार में हिस्सेदारी पाने की एक बड़ी जंग बन चुका है। Tata Motors ने Tiago.ev से लेकर Harrier.ev तक अपने पूरे पोर्टफोलियो में इसे लागू कर दिया है। वहीं, Mahindra & Mahindra ने अपनी नई 'Electric Origin' लाइनअप, जिसमें BE 6 SPORTEQ और XEV सीरीज शामिल हैं, में इसे जोड़ा है।

निवेशकों के लिए यहाँ 3 बड़े रिस्क हैं:

  1. मार्जिन पर दबाव: कीमत घटाने की इस होड़ से कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
  2. क्रेडिट क्वालिटी: चूंकि यह एक तरह का फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर है, इसलिए कंपनियों को लोन की रिकवरी और क्रेडिट रिस्क पर कड़ी नजर रखनी होगी।
  3. रेसिडुअल वैल्यू: बैटरी तकनीक तेजी से बदल रही है, जिससे फाइनेंसर्स के लिए पुरानी गाड़ियों की वैल्यू तय करना मुश्किल हो रहा है।

पारदर्शिता (Transparency) का सवाल

एक्सपर्ट्स का कहना है कि दो अलग फाइनेंसिंग प्लान होने के कारण ग्राहकों के लिए गाड़ी की कुल लागत (Total cost of ownership) को समझना मुश्किल हो सकता है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या यह मॉडल केवल सेल्स वॉल्यूम बढ़ा रहा है या कंपनी के बैलेंस शीट पर भी सकारात्मक असर डाल रहा है। अगले कुछ क्वार्टर यह तय करेंगे कि क्या यह मॉडल लंबी अवधि के लिए सस्टेनेबल है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.