भारत की प्रमुख ऑटो कंपनियां अब ग्रिड पर निर्भरता कम कर रही हैं। Tata Motors और Maruti Suzuki जैसी कंपनियां सोलर और विंड एनर्जी में निवेश कर रही हैं, ताकि बिजली का खर्च **₹7-₹9** प्रति यूनिट से घटकर **₹3.5-₹4.5** प्रति यूनिट तक आ सके।
ग्रीन एनर्जी का गणित
ऑटो सेक्टर इस बदलाव के जरिए अपनी ऑपरेटिंग कॉस्ट को स्टेबल करना चाहता है। खुद के सोलर और विंड पावर प्रोजेक्ट्स लगाने से कंपनियों को लॉन्ग टर्म में बड़ी बचत की उम्मीद है। मौजूदा समय में ग्रिड से मिलने वाली बिजली की दरें ₹7 से ₹9 प्रति यूनिट तक हैं, जबकि रिन्यूएबल सोर्स से इसे ₹3.5 से ₹4.5 के बीच लाया जा सकता है।
Tata Motors इस रेस में आगे है, जिसने फाइनेंशियल ईयर 2026 में अपनी 83% बिजली रिन्यूएबल स्रोतों से हासिल की है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक इसे 100% तक ले जाने का है। वहीं, Maruti Suzuki भी अपनी प्रोडक्शन क्षमता को 2030 तक 40 लाख यूनिट तक ले जाने के साथ-साथ क्लीन एनर्जी पर खासा जोर दे रही है।
निवेश और जोखिम (Capital and Execution Risks)
इस बदलाव के लिए कंपनियों को भारी मात्रा में कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) करना पड़ रहा है। यह निवेश तब हो रहा है जब कंपनियां पहले से ही इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) डेवलपमेंट और नई टेक्नोलॉजी पर अरबों खर्च कर रही हैं। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या यह कर्ज का बोझ बढ़ाएगा या फिर लॉन्ग टर्म मार्जिन में सुधार लाएगा।
इसके अलावा, प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करना (Execution) भी एक बड़ी चुनौती है। जमीन का अधिग्रहण, पावर स्टोरेज और सरकारी नियमों (जैसे ओपन एक्सेस रूल्स) में बदलाव भी इन बचत योजनाओं के गणित को बदल सकते हैं। आने वाली तिमाही नतीजों में यह साफ हो पाएगा कि बिजली खर्च में आई कमी का फायदा सीधे ऑपरेटिंग मार्जिन में दिख रहा है या नहीं।
