चीन की तरफ से बैटरी टेक्नोलॉजी पर पाबंदियां लगाए जाने के बाद भारतीय EV सेक्टर के सामने संकट खड़ा हो गया है। तकनीक न मिलने के कारण JSW Group ने अपना **50 GWh** का गीगाफैक्ट्री प्रोजेक्ट फिलहाल रोक दिया है, वहीं Amara Raja Energy & Mobility अब इन-हाउस R&D पर जोर दे रही है।
भारत का ऑटोमोटिव सेक्टर इस वक्त एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। चीन द्वारा बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और क्रिटिकल मिनरल्स के एक्सपोर्ट पर लगाई गई पाबंदियों के कारण भारतीय कंपनियों को अपने बिजनेस प्लान्स को फिर से तैयार करना पड़ रहा है। अब तक भारतीय मैन्युफैक्चरर्स LFP बैटरी टेक्नोलॉजी के लिए चीन पर निर्भर थे, लेकिन अब यह रास्ता लगभग बंद होता दिख रहा है।
प्रोजेक्ट्स पर गहरा असर
इस बदलाव का असर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर दिखना शुरू हो गया है। JSW Group ने ओडिशा में अपनी महत्वाकांक्षी 50 GWh की बैटरी गीगाफैक्ट्री को होल्ड पर डाल दिया है, क्योंकि उन्हें जरूरी टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप नहीं मिल पाई। वहीं, Amara Raja Energy & Mobility ने भी अपनी रणनीति बदली है। चीन की कंपनी Gotion के साथ टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग डील न हो पाने के बाद, कंपनी अब एक्सटर्नल लाइसेंसिंग की जगह खुद की रिसर्च और ग्लोबल एक्सपर्ट्स को हायर करने पर ध्यान दे रही है।
सप्लाई चेन और आत्मनिर्भरता की चुनौती
सिर्फ बैटरी ही नहीं, हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रिक मोटर्स के लिए जरूरी रेयर-अर्थ मैग्नेट्स की कमी भी एक बड़ा सिरदर्द है। अब कंपनियां वियतनाम और यूरोप जैसे देशों की ओर रुख कर रही हैं, या फिर फेराइट मैग्नेट्स का इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन में बदलाव कर रही हैं। यह पूरी कवायद महंगी है, क्योंकि LFP टेक्नोलॉजी का सस्ता विकल्प ढूँढना फिलहाल बड़ी चुनौती है।
इस बीच, सरकार ने बैटरी सेल कंपोनेंट्स के लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹13,000 करोड़ के इंसेंटिव पैकेज का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, शून्य से एक घरेलू इकोसिस्टम खड़ा करना न सिर्फ महंगा है, बल्कि इसमें काफी समय भी लगेगा। इन्वेस्टर्स के लिए देखने वाली बात यह होगी कि कंपनियां इन रिसर्च प्रोजेक्ट्स को कितनी तेजी से जमीन पर उतार पाती हैं और मार्जिन पर पड़ने वाले दबाव को कैसे मैनेज करती हैं।
