साल 2026 में भारतीय ऑटो-टेक स्टार्टअप्स का जलवा फीका पड़ता दिख रहा है। 97 डील्स के जरिए कंपनियों ने केवल **$1.3 बिलियन** जुटाए हैं, जो पिछले साल के **$2.1 बिलियन** के मुकाबले काफी कम है।
फंडिंग की रफ्तार में क्यों आई कमी?
इन्वेस्टर सेंटिमेंट में बड़ा बदलाव आया है। पहले स्टार्टअप्स केवल तेजी से ग्राहकों की संख्या बढ़ाने पर फोकस करते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। निवेशक अब 'यूनिट इकोनॉमिक्स' यानी हर सेल पर होने वाले मुनाफे को प्राथमिकता दे रहे हैं। जो कंपनियां अपनी लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी साबित नहीं कर पा रही हैं, उनके लिए पैसा जुटाना नामुमकिन सा हो गया है।
मुश्किल हुआ रास्ता
फंडिंग के बड़े दौर तक पहुंचना भी अब कठिन होता जा रहा है। डेटा के अनुसार, किसी स्टार्टअप को Series C फंडिंग तक पहुंचने में अब औसतन 5.7 साल का समय लग रहा है। निवेशक पैसा लगाने से पहले काफी सख्त फाइनेंशियल चेक्स कर रहे हैं, जिससे शुरुआती दौर की कंपनियों का टिके रहना मुश्किल हो गया है।
बेंगलुरु का दबदबा जारी
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो सारा पैसा कुछ चुनिंदा शहरों में ही सिमटा हुआ है। अकेले बेंगलुरु ने कुल फंड का 50% से ज्यादा हिस्सा हासिल किया है। Ola Electric और Cars24 जैसे बड़े नाम अपनी लोकेशन पर भारी निवेश खींचने में सफल रहे हैं, जबकि Rapido और Simple Energy के लिए भी यह साल चुनौतियों भरा रहा है।
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में इस सेक्टर में बड़ी Consolidation की लहर देखी जा सकती है। फिलहाल सिर्फ 32 कंपनियां ऐसी हैं जो Series D या उससे आगे के चरण में हैं। बाजार में भीड़ बढ़ने के कारण, अब छोटी या संघर्ष कर रही कंपनियां मर्जर या बड़ी कंपनियों द्वारा अधिग्रहण (Acquisition) का रास्ता अपना सकती हैं।
