भारतीय ऑटो कंपनियां इस फेस्टिव सीजन में बड़ी चुनौती का सामना कर रही हैं। शोरूम्स में गाड़ियों का स्टॉक **43-45 दिन** तक पहुंच गया है, जो सामान्य **21 दिन** के बेंचमार्क से कहीं ज्यादा है। बढ़ती कीमतें और महंगी ओनरशिप कॉस्ट के कारण डिमांड सुस्त पड़ रही है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
भारतीय ऑटो सेक्टर फिलहाल एक बड़े विरोधाभास में फंसा हुआ है। भले ही सितंबर 2026 में कुल रिटेल बिक्री 2.53 मिलियन यूनिट्स रही, लेकिन यह ग्रोथ मुख्य रूप से पिछले साल के कम आधार (low base effect) के कारण है। असल चिंता यह है कि डीलरशिप्स पर गाड़ियों का भारी स्टॉक जमा हो गया है। 43-45 दिनों का स्टॉक लेवल यह साफ दिखाता है कि फैक्ट्रियों से गाड़ियां तो निकल रही हैं, लेकिन शोरूम्स से ग्राहकों तक नहीं पहुंच रही हैं।
मार्जिन पर सीधा असर
यह हाई इन्वेंट्री एक लिक्विडिटी रिस्क पैदा कर रही है। स्टॉक को क्लियर करने के लिए कंपनियों को भारी डिस्काउंट देने पड़ते हैं, जो सीधा उनके प्रॉफिट मार्जिन को चोट पहुंचाते हैं। अनुमान है कि सितंबर तिमाही में ऑटो कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में साल-दर-साल 200 बेसिस पॉइंट्स तक की गिरावट आ सकती है।
ग्राहकों की घटती दिलचस्पी
Maruti Suzuki, Tata Motors और Mahindra & Mahindra जैसे ब्रांड्स की लगातार प्राइस हाइक के बाद गाड़ियां मिडिल-क्लास बजट से बाहर होती जा रही हैं। हाई इंटरेस्ट रेट्स के चलते ग्राहक या तो खरीदारी टाल रहे हैं या फिर पुरानी गाड़ियों (pre-owned market) का रुख कर रहे हैं।
बाजार की सुस्ती
शेयर बाजार में इसका असर साफ है। साल 2026 में दिग्गज ऑटो स्टॉक्स में 16% से 32% तक की गिरावट दर्ज की गई है। अगर फेस्टिव सीजन के बाद बिक्री में तेजी नहीं आई, तो कंपनियों को प्रोडक्शन में कटौती करनी पड़ सकती है। अब निवेशकों की नजरें आने वाले तिमाही नतीजों और मैनेजमेंट की कमेंट्री पर टिकी हैं कि वे इस डिमांड-सप्लाई गैप को कैसे मैनेज करते हैं।
