त्योहारी सीजन के बावजूद भारतीय ऑटो मार्केट में एक बड़ी चुनौती उभर रही है। चुनिंदा पॉपुलर मॉडल्स पर लंबा वेटिंग पीरियड है, लेकिन डीलरशिप्स पर स्टॉक जमा हो रहा है। होलसेल और रिटेल बिक्री के बीच का यह फासला निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट इस फेस्टिव सीजन एक जटिल दौर से गुजर रहा है। एक तरफ चुनिंदा SUV मॉडल्स की डिमांड जबरदस्त है, तो दूसरी तरफ मैन्युफैक्चरर्स द्वारा भेजे गए होलसेल शिपमेंट और डीलरशिप्स पर होने वाली असल रिटेल बिक्री के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। निवेशकों के लिए यह एक 'रेड फ्लैग' हो सकता है, क्योंकि इन्वेंट्री का अधिक होना भविष्य में मार्जिन प्रेशर और होलसेल नंबर्स में गिरावट का संकेत देता है।
वेटिंग पीरियड का गणित
डिलीवरी का समय पूरी तरह से मॉडल, वेरिएंट और लोकेशन पर निर्भर कर रहा है। उदाहरण के लिए, Toyota Innova Hycross के लिए ग्राहकों को 3 से 8 महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं, Mahindra XUV 7XO के बेस पेट्रोल और डीजल मॉडल्स पर वेटिंग पीरियड 40 हफ्ते तक पहुंच गया है, जबकि डीजल AWD AX7 L के लिए यह करीब 34 हफ्ते है। महिंद्रा की इलेक्ट्रिक गाड़ियों जैसे XEV 9S पर भी लोकेशन के हिसाब से 2 से 7 महीने का समय लग रहा है।
कंपनियों का हाल-चाल
Hyundai Motor India के केस में एक अजीब विरोधाभास दिख रहा है। कंपनी Creta पर ₹1 लाख तक का डिस्काउंट दे रही है, लेकिन मुंबई जैसे शहरों में इसके डीजल वेरिएंट्स के लिए 26 से 30 हफ्ते का वेटिंग पीरियड है। इसके उलट Tata Motors की सप्लाई चेन काफी मजबूत नजर आ रही है, जहाँ Nexon, Safari और Curvv जैसे मॉडल्स 1 से 2 महीने में उपलब्ध हैं। Maruti Suzuki की Brezza की डिलीवरी भी 6 से 8 हफ्ते के भीतर हो रही है।
निवेशकों के लिए चिंता का कारण
असली पेंच होलसेल और रिटेल बिक्री के तालमेल में है। जब कंपनियों द्वारा डीलर्स को भेजी गई गाड़ियां (Wholesale) ग्राहकों को बिकने वाली गाड़ियों (Retail) से ज्यादा होती हैं, तो डीलरशिप्स पर स्टॉक का ढेर लग जाता है। यदि दिवाली के बाद भी इन्वेंट्री का स्तर कम नहीं हुआ, तो कंपनियों को होलसेल नंबर्स घटाने पड़ सकते हैं या डीलर्स को एक्स्ट्रा सपोर्ट देना पड़ सकता है, जिससे उनकी फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर असर पड़ना तय है। अब बाजार की नजरें इस पर टिकी हैं कि फेस्टिव सीजन के बाद यह इन्वेंट्री करेक्शन कैसे होता है।
