भारतीय ऑटो पार्ट्स सेक्टर में एक बड़ा संकट सामने आया है। करीब **₹98,000 करोड़** की भारी-भरकम पूंजी पुरानी और अनसोल्ड इन्वेंट्री में फंसी हुई है, जिससे कंपनियों की लिक्विडिटी पर बुरा असर पड़ रहा है।
इन्वेंट्री का बोझ और लिक्विडिटी का संकट
Vector Consulting Group की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय ऑटो कंपोनेंट सेक्टर की ₹98,000 करोड़ की पूंजी रुकी हुई है। यह स्थिति कंपनियों के लिए बाधा बनी हुई है, क्योंकि उन्हें इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड सॉफ्टवेयर जैसे भविष्य के क्षेत्रों में बड़े निवेश की जरूरत है।
प्रोडक्टिविटी का विरोधाभास (The Productivity Paradox)
आंकड़े बताते हैं कि प्लांट 75% से 85% क्षमता पर काम कर रहे हैं, फिर भी ज्यादातर मैनेजमेंट का मानना है कि उनके पास जगह और क्षमता की कमी है। असल में समस्या मशीनों की कमी नहीं, बल्कि आंतरिक इनएफिशिएंसी है—जैसे प्रोडक्शन में बार-बार बदलाव, हाई रीवर्क रेट और मटेरियल फ्लो में तालमेल न होना। इस कारण कंपनियां बिना जरूरत के कैपेसिटी एक्सपेंशन पर खर्च कर रही हैं, जो उनके बैलेंस शीट को कमजोर कर रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इस सेक्टर का 80% हिस्सा MSMEs से बना है। इन छोटी कंपनियों के लिए कैश का सही मैनेजमेंट बहुत जरूरी है ताकि वे खुद के दम पर रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) कर सकें और कर्ज के जाल से बच सकें।
निवेशकों को अब केवल रेवेन्यू ग्रोथ ही नहीं, बल्कि इन्वेंट्री टर्नओवर रेशियो और वर्किंग कैपिटल साइकिल पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। जो कंपनियां इस फंसे हुए कैश को रिलीज करके भविष्य की तकनीक में निवेश करेंगी, वही लंबी अवधि में बेहतर मार्जिन और मजबूत बैलेंस शीट के साथ टिक पाएंगी।
