भारतीय ऑटो कंपोनेंट निर्माता अब ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने के लिए विदेशों में अपने कारखाने स्थापित कर रहे हैं। इनका लक्ष्य 2030 तक एक्सपोर्ट को **$45 बिलियन** तक ले जाना है, लेकिन निवेशकों को बढ़ते कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) और मार्जिन दबाव पर नजर रखने की जरूरत है।
ग्लोबल ऑटोमेकर्स अब अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए सिंगल-कंट्री सप्लायर्स पर निर्भरता कम कर रहे हैं। यह बदलाव भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियों के लिए एक बड़ा मौका बनकर उभरा है, जो अब डिमांड पूरी करने के लिए अलग-अलग देशों में अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ा रहे हैं।
एक्सपोर्ट का बड़ा टारगेट
Boston Consulting Group और Automotive Component Manufacturers Association of India (ACMA) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट जो फाइनेंशियल ईयर 2026 में $24 बिलियन था, उसके दशक के अंत तक $45 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इंडस्ट्री का कुल टर्नओवर वित्त वर्ष 2026 में लगभग ₹7.6 लाख करोड़ रहा है, और अब कंपनियां खुद को सिर्फ लो-कॉस्ट मैन्युफैक्चरर से आगे बढ़कर एक 'इंजीनियरिंग पार्टनर' के तौर पर पेश कर रही हैं।
बड़ी कंपनियों की रणनीति
Suprajit Engineering इस बदलाव में सबसे आगे है, जिसके प्लांट अब भारत, चीन, मेक्सिको, हंगरी और मोरक्को तक फैले हुए हैं। वहीं, SPR Auto Technologies जैसे प्लेयर्स इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड गाड़ियों के लिए जटिल कंपोनेंट्स पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ताकि पारंपरिक इंजनों पर निर्भरता घटाई जा सके।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
हालांकि यह विस्तार लॉन्ग-टर्म में अच्छा है, लेकिन सेक्टर के सामने कुछ बड़ी बाधाएं भी हैं:
- मार्जिन पर मार: इंडस्ट्री के मुनाफे में हाल ही में लगभग 250 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट देखी गई है।
- बढ़ती लागत: कच्चे माल (Raw material) और एनर्जी की कीमतों में उतार-चढ़ाव मुनाफे को प्रभावित कर रहे हैं।
- कैपेक्स का बोझ: विदेश में कारखाने लगाने के लिए भारी मात्रा में कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) की जरूरत होती है, जिससे शॉर्ट-टर्म में कैश फ्लो पर दबाव और कर्ज बढ़ने का जोखिम रहता है।
आने वाले समय में, इन कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अलग-अलग क्षेत्रों में कैसे तालमेल बिठाती हैं और क्या वे महंगे इंजीनियरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स को मुनाफे में बदल पाती हैं या नहीं।
