भारतीय ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं के लिए अमेरिकी बाजार से कोई अच्छी खबर नहीं है। मौजूदा राजनीतिक बदलावों के बावजूद अमेरिका द्वारा लगाए गए **10%** से **25%** तक के टैरिफ जारी हैं, जिससे भारत के कुल एक्सपोर्ट का **26%** हिस्सा प्रभावित हो रहा है।
भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियों के लिए ट्रेड अनिश्चितता का दौर लंबा खिंचता दिख रहा है। अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बावजूद वहां की व्यापार नीतियों में कोई राहत नहीं मिली है, जिसका सीधा असर भारतीय कंपनियों की कॉस्ट और मार्जिन पर पड़ रहा है।
क्या है मौजूदा स्थिति?
24 जुलाई, 2026 से भारतीय ऑटो पार्ट्स पर 10% का 'सेक्शन 301' ड्यूटी लागू है, जबकि कुछ खास कंपोनेंट्स पर 25% तक का भारी-भरकम 'सेक्शन 232' टैरिफ वसूला जा रहा है। अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा मार्केट है, जहां देश का 26% ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट जाता है। 2026 फाइनेंशियल ईयर में कुल एक्सपोर्ट $24 बिलियन रहा था, लेकिन इन टैरिफ्स के कारण भारतीय कंपनियां मेक्सिको और कनाडा जैसे देशों के मुकाबले पिछड़ रही हैं।
USTR की जांच और बढ़ता रिस्क
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। Office of the US Trade Representative (USTR) भारत में 'स्ट्रक्चरल एक्सेस मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी' को लेकर जांच कर रहा है। यह रेगुलेटरी रिस्क कंपनियों को अमेरिका में लॉन्ग-टर्म विस्तार की योजना बनाने से रोक रहा है।
निवेशकों के लिए चिंता का विषय
सेक्टर की खराब होती वित्तीय सेहत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले फाइनेंशियल ईयर में इंडस्ट्री ने $1.4 बिलियन का अपना पहला ट्रेड डेफिसिट दर्ज किया है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल पाएंगी या फिर आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर देखने को मिलेगा। आगे के लिए मैनेजमेंट की कमेंट्री और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (bilateral trade negotiations) पर नजर रखना जरूरी है।
