कार बनाने की लागत का **50%** से ज्यादा हिस्सा अब इलेक्ट्रॉनिक्स पर खर्च होगा। BCG और ACMA की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स के लिए यह एक बड़ा अवसर है, लेकिन इसके लिए मैकेनिकल से हाई-टेक R&D की ओर मुड़ना जरूरी होगा।
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। BCG और Automotive Component Manufacturers Association की ताजा रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 में गाड़ियों की कुल लागत में इलेक्ट्रॉनिक्स का हिस्सा सिर्फ 30% था, जो 2030 तक बढ़कर 50% से 55% तक पहुंच जाएगा। इस बदलाव की मुख्य वजह कनेक्टेड फीचर्स, एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम और इलेक्ट्रिक व्हीकल की बढ़ती मांग है।
भारतीय कंपनियों के लिए चुनौतियां और मौके
फिलहाल भारत में ऑटो कंपोनेंट सप्लाई में इलेक्ट्रॉनिक्स का योगदान केवल 12% के करीब है। इंडस्ट्री ने 2030 तक $200 बिलियन की कुल वैल्यूएशन का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसे हासिल करने के लिए बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव करना होगा। केवल प्रोडक्शन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, कंपनियों को सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में भारी निवेश करना होगा।
मार्जिन पर दबाव और रिस्क
फिलहाल, ऑटो कंपोनेंट कंपनियां कच्चे माल (जैसे स्टील और एल्युमिनियम) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ते फ्रेट खर्च के कारण मार्जिन के दबाव का सामना कर रही हैं। इसके अलावा, ग्लोबल सप्लाई चेन के झटकों से बचने के लिए कंपनियों को अपना इन्वेंट्री लेवल भी बढ़ाना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर कैश फ्लो पर पड़ता है।
निवेशकों को अब कंपनियों के R&D खर्च और नए इलेक्ट्रॉनिक ऑर्डर्स पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही भविष्य में उनकी प्रॉफिटेबिलिटी तय करेंगे।
