66वें SIAM कन्वेंशन में भारतीय ऑटो सेक्टर ने अपनी भविष्य की रणनीति साफ कर दी है। अब सब्सिडी-आधारित मॉडल के बजाय प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और स्वदेशी R&D पर जोर दिया जाएगा।
भारतीय ऑटोमोटिव इंडस्ट्री ने एक नई दिशा तय कर ली है। 3 सितंबर, 2026 को आयोजित 66वें SIAM कन्वेंशन में इंडस्ट्री लीडर्स ने साल 2047 तक भारत को ग्लोबल मोबिलिटी हब बनाने का लक्ष्य रखा है। यह रणनीति सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें बायोफ्यूल, CNG और ग्रीन हाइड्रोजन को भी शामिल किया जाएगा ताकि आम आदमी के लिए वाहन किफायती बने रहें।
सब्सिडी से PLI की ओर कदम
कन्वेंशन का सबसे बड़ा हाइलाइट FAME जैसी सीधी सब्सिडी योजनाओं से दूरी बनाना रहा। सरकार ने संकेत दिए हैं कि अब इंडस्ट्री को अपनी स्केल और कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाने के लिए PLI मॉडल पर निर्भर होना होगा। यह सेक्टर देश के GST कलेक्शन में करीब 15% का योगदान देता है और इसका वैल्यूएशन ₹22.75 लाख करोड़ से ज्यादा है। निवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि सब्सिडी हटने से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। जिन कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन को लोकलाइज किया है, वे इस बदलाव को बेहतर तरीके से संभाल पाएंगी।
AI और स्वदेशी टेक्नोलॉजी पर दांव
अब असेंबली से आगे बढ़कर स्वदेशी रिसर्च पर जोर दिया जा रहा है। Mahindra & Mahindra जैसी कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग और कस्टमर सर्विस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटोमेटेड ड्राइविंग और AI का एकीकरण भारत को ग्लोबल मार्केट में एक्सपोर्ट हब बनाने के लिए जरूरी है।
चुनौतियां और जोखिम
लंबे समय के लिए रोडमैप तैयार है, लेकिन सेक्टर के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। आक्रामक प्राइसिंग पॉलिसी से आम ग्राहक दूर हो सकता है। साथ ही, सॉफ्टवेयर और AI-इंटीग्रेटेड वाहनों की ओर बढ़ते कदम के कारण स्किल्स की कमी भी एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के लिए इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी। निवेशकों को कंपनियों के R&D खर्च और नए प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन टाइमलाइन पर नजर रखनी चाहिए।
