सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) ने पेट्रोल और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए नए सेफ्टी नियम जारी किए हैं, जो **2027** से **2029** के बीच लागू होंगे। इसमें क्रैश-टेस्ट और बैटरी सुरक्षा जैसे कड़े मानक शामिल हैं, जिसका सीधा असर ऑटो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने भारत में ऑटोमोटिव सुरक्षा नियमों को कड़ा कर दिया है, जिसके लिए पूरे उद्योग को 3 साल का समय दिया गया है। अक्टूबर 2027 से कार कंपनियों को फ्रंटल और साइड इम्पैक्ट के लिए सख्त क्रैश-टेस्ट प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य होगा। नए मॉडल्स को अक्टूबर 2027 तक इन मानकों को पूरा करना होगा, जबकि मौजूदा मॉडल्स के लिए अक्टूबर 2028 तक की मोहलत दी गई है।
कंपनियों के मुनाफे पर दबाव की आशंका
इन बदलावों के लिए कंपनियों को रिसर्च, डेवलपमेंट और इंजीनियरिंग पर भारी निवेश करना होगा। गाड़ियों के ढांचे को फिर से डिजाइन करने से प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ेगी। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि कंपनियां खुद इस बढ़े हुए खर्च को झेलती हैं या फिर कारों की कीमतें बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर डालती हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के लिए विशेष नियम
सरकार ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए बैटरी और इलेक्ट्रिकल खतरों को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। अप्रैल 2029 तक सभी नई गाड़ियों के लिए रियर-इम्पैक्ट टेस्टिंग और फ्यूल लीक लिमिट अनिवार्य होगी। EV के लिए, टक्कर के दौरान बैटरी का अपनी जगह पर सुरक्षित रहना और हाई-वोल्टेज सर्किट का ऑटोमैटिक डिस्कनेक्ट होना अनिवार्य होगा।
क्या है भविष्य की योजना?
अक्टूबर 2028 से पैदल चलने वालों की सुरक्षा (Pedestrian Protection) के लिए नए मानक लागू होंगे, जिसके तहत गाड़ियों के फ्रंट डिजाइन में बदलाव करना होगा। साथ ही, अक्टूबर 2029 से गाड़ियों में विमानों की तरह 'इवेंट डेटा रिकॉर्डर' (EDR) लगाना भी जरूरी होगा।
निवेशकों के लिए अब प्रमुख ऑटो कंपनियों का मैनेजमेंट कमेंट्री देखना महत्वपूर्ण होगा। जिनके पास इन-हाउस R&D क्षमता मजबूत है, वे बेहतर तरीके से ढल पाएंगे, जबकि सीमित बजट वाली कंपनियों के लिए ये बदलाव एक चुनौती साबित हो सकते हैं।
