नई रिसर्च के मुताबिक, अगर भारत तेजी से इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) को अपनाता है, तो साल 2050 तक सालाना इंपोर्ट बिल में **$125 बिलियन** की बड़ी बचत हो सकती है। यह बचत मुख्य रूप से कच्चे तेल पर निर्भरता कम होने से आएगी।
भारत के पास साल 2050 तक अपने सालाना इंपोर्ट खर्च को $125 बिलियन तक कम करने का शानदार मौका है, बशर्ते देश बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम को अपना ले। रिसर्च से साफ है कि बैटरी की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे ज्यादा आर्थिक फायदा पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने से होगा।
ऑयल डिस्प्लेसमेंट का अर्थशास्त्र
इलेक्ट्रिफिकेशन का सीधा असर देश की कच्चा तेल आयात करने की निर्भरता पर पड़ेगा। फिलहाल, ट्रांसपोर्टेशन के कारण हमारा इंपोर्ट बिल करीब $153 बिलियन के आसपास रहता है, जो इस बदलाव के बाद घटकर $59 बिलियन तक आ सकता है। यह ट्रांजिशन न केवल विदेशी मुद्रा बचाएगा, बल्कि ग्लोबल मार्केट में तेल की बढ़ती कीमतों के झटकों से भी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखेगा।
बैटरी इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
बैटरी की मांग आने वाले सालों में रॉकेट की तरह बढ़ने वाली है। अनुमान है कि यह मांग साल 2030 के 28 गीगावाट आवर से बढ़कर 2050 तक 570 गीगावाट आवर के पार पहुंच जाएगी। फिलहाल, हम बैटरी सेल के मामले में ग्लोबल स्टैंडर्ड से पीछे हैं। अब इंडस्ट्री को सिर्फ असेंबली तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि डीप इंजीनियरिंग और आत्मनिर्भरता पर जोर देना होगा ताकि हम टेक्नोलॉजी एक्सपोर्टर बन सकें।
जोखिम और चुनौतियां
इस लक्ष्य को हासिल करने की राह में कुछ बड़े जोखिम भी हैं। फिलहाल घरेलू स्तर पर बैटरी सेल मैन्युफैक्चरिंग की कमी हमें विदेशों पर निर्भर रखती है। साथ ही, टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर और हैवी कमर्शियल व्हीकल्स में EV अपनाने की गति कितनी तेज रहती है, यह भी मायने रखेगा। निवेशकों को अब स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी, कच्चे माल की उपलब्धता और EV अडॉप्शन के जमीनी आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
