सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) ने एक ड्राफ्ट जारी किया है जिसके तहत अब टैक्सियों और पैसेंजर गाड़ियों में ADAS जैसे एडवांस सेफ्टी फीचर्स लगाना अनिवार्य होगा। यह कदम सड़क सुरक्षा तो बढ़ाएगा ही, साथ ही ऑटो कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ा सकता है और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट सप्लायर्स के लिए बड़े मौके ला सकता है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने एक नया ड्राफ्ट प्रस्ताव पेश किया है, जो भारतीय टैक्सी इंडस्ट्री के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। नए नियमों के अनुसार, M1-कैटेगरी की गाड़ियों—जिनमें पैसेंजर ट्रांजिट के लिए इस्तेमाल होने वाली कारें और टैक्सी शामिल हैं—में एडवांस सेफ्टी टेक्नोलॉजी होना अनिवार्य होगा। अक्टूबर 2029 तक, इन गाड़ियों में ऑटोमैटिक स्टीयरिंग, इमरजेंसी लेन-कीपिंग सिस्टम और ड्राइवर की सुस्ती पहचानने वाले सेंसर्स लगाना जरूरी होगा।
फेज़्ड मैनर में होगा लागू
सरकार ने ऑटो कंपनियों को तैयारी का मौका देने के लिए एक फेज़्ड टाइमलाइन तय की है। नए मॉडल्स के लिए कंप्लायंस 1 अक्टूबर 2027 से शुरू होंगे। इसके अलावा, एडवांस्ड इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (AEBS) को 2030 तक नए मॉडल्स में और 2032 तक सभी प्रोडक्शन लाइनों में अनिवार्य किया जाएगा। साथ ही, अप्रैल और अक्टूबर 2028 के बीच लगेज रिटेंशन और चाइल्ड सेफ्टी एंकरेज से जुड़े नए नियम भी लागू किए जाएंगे।
ऑटो OEMs और कंपोनेंट सप्लायर्स पर असर
ऑटो सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक बड़ा बदलाव है। पहला, व्हीकल मैन्युफैक्चरर्स यानी OEMs पर प्रोडक्शन कॉस्ट का दबाव बढ़ेगा। गाड़ियों में सेंसर, कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स जोड़ने से 'बिल ऑफ मटेरियल' में इजाफा होगा। एंट्री-लेवल टैक्सी सेगमेंट में, जहां कीमतें बहुत संवेदनशील होती हैं, वहां कंपनियों के लिए इन खर्चों को ग्राहकों पर डालना एक बड़ी चुनौती होगी।
दूसरा, यह ऑटो एंसिलरी इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा 'टेलविंड' हो सकता है। जो कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर्स और सेफ्टी कंपोनेंट्स बनाती हैं, उनके लिए मांग में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है। ऑटो कंपनियां अब इन नए मानकों को पूरा करने के लिए भरोसेमंद सप्लायर्स की तलाश करेंगी, जिससे उन्हें सीधा फायदा मिलेगा।
निवेश के नजरिए से क्या ध्यान रखें?
फिलहाल यह सिर्फ एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन है। सरकार ने स्टेकहोल्डर्स से सुझाव और आपत्तियां मांगने के लिए 30 दिनों का समय दिया है। निवेशकों को इस अवधि पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इंडस्ट्री के फीडबैक के बाद फाइनल नोटिफिकेशन में कुछ बदलाव हो सकते हैं।
मंत्रालय ने साफ किया है कि यह नियम सिर्फ भविष्य में बनने वाली गाड़ियों पर लागू होंगे, यानी पुरानी गाड़ियों में रेट्रोफिटिंग का कोई खर्च नहीं होगा। हालांकि, नई प्रोडक्शन लाइनों में इन सिस्टम्स को इंटीग्रेट करने के लिए रिसर्च और सप्लाई चेन में भारी इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि कंपनियां अपनी प्रोजेक्ट टाइमलाइन को कैसे मैनेज करती हैं और क्या सेमीकंडक्टर-बेस्ड कंपोनेंट्स की किल्लत जैसी कोई समस्या सामने आती है या नहीं।
