भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के लिए मिलने वाली वित्तीय सब्सिडी को अगले पांच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का फैसला किया है। सरकार अब अपना ध्यान सीधे कंपनियों को मदद देने के बजाय चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और खुद की रिसर्च (R&D) क्षमता को मजबूत करने पर केंद्रित कर रही है।
भारत के इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सेक्टर में अब एक नए दौर की शुरुआत होने जा रही है। भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव कामरान रिज़वी ने स्पष्ट किया है कि अगले 4 से 5 वर्षों में सरकार सरकारी वित्तीय सहायता को धीरे-धीरे बंद कर देगी। सरकार का मानना है कि EV मार्केट के प्रमुख सेगमेंट अब व्यावसायिक रूप से इतने परिपक्व हो चुके हैं कि उन्हें अब सरकारी बैसाखी की जरूरत नहीं है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर का एडॉप्शन मार्केट में 50% तक पहुंच चुका है, जो 2026 के लिए तय 10% के लक्ष्य से कहीं ज्यादा है। इसके अलावा, टू-व्हीलर सेगमेंट में भी EV की पहुंच करीब 7% हो गई है। लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए अब मंत्रालय का मानना है कि यह इंडस्ट्री अपने दम पर खड़े होने के लिए तैयार है।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और R&D पर जोर
सरकार ने चार्जिंग नेटवर्क बनाने के लिए ₹2,000 करोड़ का फंड आवंटित किया है, लेकिन अब जिम्मेदारी ऑटो कंपनियों पर डाल दी गई है। सरकार चाहती है कि कंपनियां 60 रणनीतिक नेशनल कॉरिडोर पर चार्जिंग स्टेशन विकसित करने में लीड लें। कंपनियों को अब केवल तकनीक अपनाने वाले नहीं, बल्कि तकनीक के आविष्कारक बनने की चुनौती दी गई है।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
जो कंपनियां सब्सिडी के सहारे अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए हुए थीं, उन्हें अब कॉस्ट एफिशिएंसी पर ध्यान देना होगा। रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में बढ़ती लागत कंपनी के कैश फ्लो पर दबाव डाल सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कौन सी कंपनियां बिना सरकारी सपोर्ट के भी अपनी यूनिट इकोनॉमिक्स को मजबूत रखती हैं। भविष्य की तिमाही रिपोर्ट में यह साफ हो जाएगा कि कौन से मैन्युफैक्चरर्स लागत कम करने में सफल रहे हैं और कौन सब्सिडी के बिना संघर्ष कर रहे हैं।
