Ministry of Heavy Industries अब इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों के लिए **₹9,852 करोड़** की फाइनेंसिंग स्कीम में इंटरेस्ट सब्सिडी देने पर विचार कर रही है। इसका मुख्य मकसद हाई-कैपेसिटी फास्ट चार्जर्स की कमी को दूर करना है ताकि कमर्शियल फ्लीट ऑपरेटर्स का काम और तेज हो सके।
हाई-कैपेसिटी चार्जिंग की चुनौती
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) अपनाने वाले फ्लीट ऑपरेटर्स के लिए आज सबसे बड़ी समस्या गाड़ी खरीदना नहीं, बल्कि उसे लगातार सड़क पर दौड़ते रखना है। ट्रकों और बसों जैसे भारी वाहनों को चार्ज करने के लिए हाई-कैपेसिटी फास्ट चार्जर्स की जरूरत होती है। फिलहाल भारत में ज्यादातर चार्जिंग पॉइंट छोटी कारों के लिए हैं, जो इन बड़े वाहनों के लिए 121kW से ज्यादा पावर नहीं दे पाते।
बिना फास्ट चार्जिंग के, ये महंगे इलेक्ट्रिक वाहन घंटों डिपो पर खड़े रहते हैं, जिससे ऑपरेटरों का काम प्रभावित होता है। सरकार अब वाहन खरीद के साथ-साथ हाई-कैपेसिटी चार्जर्स पर इंसेंटिव देकर इस गैप को भरने की कोशिश कर रही है।
PM E-DRIVE से क्या सीख रही है सरकार?
सरकार का यह नया कदम ₹10,900 करोड़ वाली PM E-DRIVE स्कीम से मिली सीख पर आधारित है। मार्च 2028 तक चलने वाली इस स्कीम में लोकल मैन्युफैक्चरिंग और पुरानी गाड़ियों को स्क्रैप करने से जुड़े नियम कुछ जटिल रहे हैं, जिससे रफ्तार धीमी रही है। नई स्कीम के जरिए सरकार इस पूरी प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश में है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risks for Investors)
हालाँकि यह कदम पॉजिटिव है, लेकिन निवेशकों को कुछ पहलुओं पर नजर रखनी चाहिए:
- GCC मॉडल में भुगतान में देरी: बस ऑपरेटर्स के लिए 'ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट' (GCC) के तहत सरकारी भुगतान में देरी नकदी की समस्या पैदा करती है।
- इंपोर्ट पर निर्भरता: बैटरी और जरूरी मिनरल्स के लिए भारत अभी भी आयात पर निर्भर है, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन में दिक्कत आने पर लागत बढ़ सकती है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार इन इंसेंटिव्स की गाइडलाइंस कैसे तय करती है और छोटे ऑपरेटर्स को इससे कितना फायदा मिलता है।
