सड़क परिवहन मंत्रालय ने नई कारों में AEBS (एडवांस्ड इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम) अनिवार्य करने की तैयारी कर ली है। कॉमर्शियल वाहनों के लिए डेडलाइन **2027** और पैसेंजर कारों के लिए **2030** तय की गई है, जिससे ऑटो कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ना तय है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को सख्त करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है। नई गाइडलाइन्स के तहत, 2030 तक सभी नई पैसेंजर कारों में AEBS लगाना अनिवार्य होगा। वहीं, उत्पादन में चल रहे मौजूदा मॉडल्स को 2032 तक का समय दिया गया है।
कॉमर्शियल सेक्टर पर पहले असर
भारी वाहनों से होने वाले हादसों को रोकने के लिए ट्रक और बस निर्माताओं को जनवरी 2027 तक यह तकनीक लागू करनी होगी। इस सिस्टम के अलावा, आने वाले समय में ब्लाइंड-स्पॉट डिटेक्शन और ड्राइवर अलर्ट जैसे स्मार्ट फीचर्स भी सेफ्टी स्टैंडर्ड्स का हिस्सा बन सकते हैं।
ऑटो कंपनियों के मुनाफे पर खतरा
Maruti Suzuki, Tata Motors और Mahindra & Mahindra जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह बदलाव चुनौतीपूर्ण है। AEBS को इंस्टॉल करने के लिए हाई-टेक रडार, कैमरे और सेंसर की जरूरत होती है। इन इक्विपमेंट्स की लागत से कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
अब सवाल यह है कि कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाएंगी या ग्राहकों पर डालेंगी? अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो एंट्री-लेवल सेगमेंट में डिमांड कम होने का रिस्क भी बना रहेगा। इसके अलावा, सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के लिए इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करना कंपनियों के लिए सबसे बड़ा टास्क होगा। आने वाले समय में कंपनियों की ओर से आने वाली मैनेजमेंट कमेंट्री और सप्लाई चेन लोकलाइजेशन पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए।
