भारत की EV महात्वाकांक्षा: FTAs के सहारे ग्लोबल लीडर बनने की तैयारी
केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सेक्टर को ग्लोबल मंच पर एक नई ऊंचाई देने के लिए कमर कस ली है। इसके लिए देश अपने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) के दायरे को लगातार बढ़ा रहा है। यह कदम न केवल EV एक्सपोर्ट को नई गति देगा, बल्कि भारत को इस तेजी से बदलते ऑटोमोबाइल परिदृश्य में एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करेगा।
एक्सपोर्ट पर जोर और 'आत्मनिर्भर भारत' का विजन
केंद्रीय मंत्री H.D. कुमारस्वामी ने तीसरे FICCI नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में इस विजन को साफ किया। उन्होंने कहा कि भारत का इलेक्ट्रिक मोबिलिटी ट्रांजिशन सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि एक मजबूत औद्योगिक रणनीति है, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन के बड़े अवसर छिपे हैं। यह रणनीति सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' और 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्यों से जुड़ी है, साथ ही 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को भी पूरा करती है।
इस पहल का एक अहम हिस्सा है - महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) की लंबी अवधि की सप्लाई सुनिश्चित करना। इसके लिए सरकार ने ₹7,280 करोड़ की एक स्कीम शुरू की है, जिसका मकसद सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। यह कदम इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए बेहद जरूरी एक फाउंडेशनल इकोसिस्टम बनाने में मदद करेगा। पिछले एक दशक में भारत के ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट में जबरदस्त उछाल देखा गया है, जो करीब $8 बिलियन से बढ़कर $16.9 बिलियन हो गया है। FTAs (जैसे EU, UK, ऑस्ट्रेलिया, UAE के साथ) के सक्रिय होने या बातचीत जारी रहने के साथ, मंत्री ने इंडस्ट्री को EV और कंपोनेंट्स के एक्सपोर्ट के लिए इन ट्रेड रूट्स का भरपूर फायदा उठाने को कहा है।
वैश्विक EV बाजार में भारत की स्थिति और संभावनाएं
पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत के अनुसार, अगले दशक में वैश्विक EV मार्केट खरबों डॉलर का हो सकता है। भारत इस ग्रोथ में अपनी एक मजबूत जगह बनाने के लिए खुद को EV, बैटरीज और क्रिटिकल कंपोनेंट्स के लिए एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर पेश कर रहा है। हालांकि, इस रास्ते में कई स्थापित खिलाड़ी पहले से मौजूद हैं। चीन अभी EV प्रोडक्शन और मार्केट शेयर में सबसे आगे है, जिसके पीछे उसकी मजबूत डोमेस्टिक सप्लाई चेन और सरकारी सपोर्ट है। यूरोप भी कड़े उत्सर्जन नियमों और बढ़ती मांग के चलते अपनी EV मैन्युफैक्चरिंग और बैटरी प्रोडक्शन में भारी निवेश कर रहा है। वहीं, अमेरिका भी 'इंफ्लेशन रिडक्शन एक्ट' जैसे कानूनों के तहत डोमेस्टिक EV मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है।
भारत का वैश्विक EV मार्केट में अभी शेयर बहुत कम है, लेकिन कंपनी की रणनीति कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस और तेजी से बढ़ती घरेलू मांग का फायदा उठाकर इंटीग्रेटेड वैल्यू चेन बनाने की है। लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता एक बड़ी कमजोरी है, खासकर जब इन संसाधनों के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज हो। REPM स्कीम एक अच्छा कदम है, लेकिन यह पूरी बैटरी सप्लाई चेन की जरूरतों का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा करती है। टाटा मोटर्स (मार्केट कैप: लगभग ₹2.8 ट्रिलियन, P/E: ~45x), महिंद्रा एंड महिंद्रा (मार्केट कैप: लगभग ₹1.6 ट्रिलियन, P/E: ~30x), और अशोक लेलैंड (मार्केट कैप: लगभग ₹500 बिलियन, P/E: ~25x) जैसी प्रमुख भारतीय ऑटो कंपनियां EV प्लेटफॉर्म्स में भारी निवेश कर रही हैं, जो सेक्टर के ग्रोथ पोटेंशियल में निवेशकों की रुचि को दिखाता है। एनालिस्ट्स भारत के EV ग्रोथ पोटेंशियल को लेकर सकारात्मक हैं, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, चार्जिंग नेटवर्क के विकास और कच्चे माल की सोर्सिंग में सुरक्षा जैसी चुनौतियों पर जोर देते हैं।
सप्लाई चेन की चुनौतियाँ और जोखिम
महत्वाकांक्षी विजन के बावजूद, भारत की EV मैन्युफैक्चरिंग योजनाओं के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी चिंता बैटरी प्रोडक्शन के लिए जरूरी लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के आयात पर देश की भारी निर्भरता है। यह निर्भरता भारत को वैश्विक मूल्य अस्थिरता और भू-राजनीतिक सप्लाई चेन व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है। ₹7,280 करोड़ की REPM स्कीम एक जरूरी कदम है, लेकिन यह जटिल बैटरी सप्लाई चेन के सिर्फ एक कंपोनेंट पर केंद्रित है।
वैश्विक प्रोडक्शन वॉल्यूम, क्वालिटी स्टैंडर्ड्स और लागत दक्षता को पूरा करने के लिए डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को बढ़ाना एक बहुत बड़ा काम होगा, जिसके लिए लगातार निवेश और तकनीकी प्रगति की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, FTAs बाजार तक पहुंच तो देते हैं, लेकिन ये स्थापित ग्लोबल EV निर्माताओं से कड़ी प्रतिस्पर्धा भी पैदा करते हैं, जिनके पास पहले से ही परिपक्व सप्लाई चेन और ब्रांड पहचान है। लक्षित निर्यात बाजारों में सुरक्षा मानकों और पर्यावरण अनुपालन जैसी संभावित नियामक जटिलताएं भी बाजार में प्रवेश को बाधित कर सकती हैं। भारत में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग पहलों के पिछले अनुभव बताते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, सुसंगत नीति कार्यान्वयन और समय पर भूमि अधिग्रहण जैसी समस्याएं गंभीर एग्जीक्यूशन रिस्क पैदा कर सकती हैं।
भविष्य की राह: खरबों डॉलर का भविष्य सुरक्षित करना
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को 'विकसित भारत 2047' का एक केंद्रीय स्तंभ माना जा रहा है। इसका लक्ष्य डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना, लोकलाइजेशन को गहरा करना और भारत को EV, बैटरीज और महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए एक ग्लोबल प्रोडक्शन हब के रूप में स्थापित करना है। इस सफलता के लिए निरंतर सरकारी समर्थन, महत्वपूर्ण प्राइवेट सेक्टर निवेश और लगातार तकनीकी नवाचार की आवश्यकता होगी। जैसे-जैसे सप्लाई चेन वैश्विक स्तर पर पुनर्गठित हो रही हैं और देश ट्रेड लोकलाइजेशन पर फिर से विचार कर रहे हैं, FTAs और डोमेस्टिक वैल्यू क्रिएशन पर भारत का रणनीतिक फोकस मल्टी-ट्रिलियन डॉलर के भविष्य के EV मार्केट में एक महत्वपूर्ण हिस्सा हासिल करने का मार्ग प्रशस्त करता है, बशर्ते एग्जीक्यूशन की चुनौतियों को चतुराई से संभाला जाए।