Nasscom ने भारत की AI और सॉफ्टवेयर क्षमताओं को यूरोप की मैन्युफैक्चरिंग विरासत के साथ जोड़ने का एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है। इस साझेदारी का लक्ष्य **2035** तक ग्लोबल कार सेल्स का करीब **25%** हिस्सा हासिल करना है, जो भारतीय इंजीनियरिंग फर्मों के लिए बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव ला सकता है।
टेक्नोलॉजी का 'सुपर हाईवे'
Nasscom के वाइस चेयरपर्सन किशोर पाटिल ने हाल ही में जर्मनी में आयोजित ELIV 2026 कांग्रेस में एक नए फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य भारत की सॉफ्टवेयर और AI इंजीनियरिंग को यूरोप की ऑटोमोटिव मैन्युफैक्चरिंग परंपरा के साथ जोड़ना है। योजना के मुताबिक, 2035 तक 2.31 करोड़ नई कारों की बिक्री का लक्ष्य रखा गया है, जो दुनिया भर की कुल ऑटो सेल्स का लगभग 25% होगा।
भारतीय कंपनियों के लिए क्या बदलेगा?
यह कदम घरेलू इंजीनियरिंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट (ER&D) सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। फिलहाल, KPIT Technologies, Tata Elxsi, Tata Technologies और L&T Technology Services जैसी कंपनियां विदेशी ग्राहकों के लिए ट्रांजेक्शनल या प्रोजेक्ट-आधारित काम करती हैं। इस नई साझेदारी से कंपनियां 'को-डेवलपमेंट' और 'शेयर्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी' (IP) मॉडल की ओर बढ़ सकती हैं, जिससे वे वैल्यू चेन में ऊपर पहुंचेंगी और जोखिम के साथ-साथ मुनाफे में भी हिस्सेदार बनेंगी।
फोकस एरिया और चुनौतियां
यह सहयोग सेमीकंडक्टर्स, एडवांस्ड बैटरी टेक्नोलॉजी, फैक्ट्री रोबोटिक्स और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसका लक्ष्य कारों के डिजाइन साइकिल को तेज करना है। हालांकि, निवेशकों को संतुलित दृष्टिकोण रखने की जरूरत है। यह अभी एक रणनीतिक प्रस्ताव है, न कि कोई सरकारी समझौता। देशों के बीच इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी शेयरिंग कानूनी तौर पर जटिल है, और वैश्विक स्तर पर ऑटो डिमांड में सुस्ती भी एक बड़ी चुनौती है।
अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह प्रस्ताव ठोस जॉइंट वेंचर्स या नए रिसर्च सेंटर्स में बदलता है। लंबी अवधि के हाई-वैल्यू कॉन्ट्रैक्ट्स ही आगे चलकर शेयरहोल्डर्स के लिए असली वैल्यू पैदा करेंगे।
