सितंबर 2026 में भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा **3.33 लाख** के पार पहुंच गया है। पैसेंजर व्हीकल की बिक्री साल-दर-साल लगभग दोगुनी हो गई है। टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा इस बाजार में लीड कर रहे हैं, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या हमारा पावर ग्रिड इस बढ़ती मांग का दबाव झेल पाएगा?
भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट ने सितंबर 2026 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। कुल रजिस्ट्रेशन 3.33 लाख यूनिट्स को पार कर गए हैं। पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में सेल्स 35,000 यूनिट्स तक पहुंच गई है, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले दोगुनी है। यह आंकड़े बताते हैं कि अब भारतीय ग्राहक रेंज की चिंताओं को पीछे छोड़ रहे हैं और इलेक्ट्रिक तकनीक को अपना रहे हैं।
बाजार में किसका दबदबा?
इलेक्ट्रिक पैसेंजर सेगमेंट में टाटा मोटर्स का कब्जा 41% से 42% मार्केट शेयर के साथ बरकरार है। वहीं, महिंद्रा एंड महिंद्रा 21% से ज्यादा मार्केट शेयर के साथ मजबूती से आगे बढ़ रही है। हालांकि, गाड़ियों की यह रफ्तार अब देश के पावर ग्रिड के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर का पेंच
EVs की बढ़ती संख्या पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर भारी दबाव बना रही है। दिक्कत सिर्फ खपत की नहीं, बल्कि डिमांड के समय की है। अगर शाम के पीक आवर्स में बड़ी संख्या में गाड़ियां चार्जिंग पर लगाई गईं, तो लोकल ट्रांसफॉर्मर और पावर लाइन्स पर ओवरलोड का खतरा बढ़ जाएगा। फिलहाल, चार्जिंग स्टेशन मुख्य रूप से बड़े शहरों तक ही सीमित हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी मास एडॉप्शन (Mass Adoption) की राह में एक बड़ा रोड़ा है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है मायने?
इन्वेस्टर्स को अब सिर्फ ऑटो कंपनियों पर नहीं, बल्कि पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के नेटवर्क अपग्रेड पर भी नजर रखनी होगी। पावर यूटिलिटी कंपनियों को अब स्मार्ट ग्रिड में भारी निवेश करना पड़ सकता है, जिसका असर उनके कैपिटल एक्सपेंडिचर पर दिख सकता है।
निवेशकों को भविष्य में यह ट्रैक करना होगा कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां नेटवर्क अपग्रेड और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी तेजी से छोटे शहरों तक पहुंचाती हैं। अगर ग्रिड का आधुनिकीकरण धीमा रहा, तो यह EV सेल्स की रफ्तार को ब्रेक लगा सकता है।
