भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बिक्री ने जून में एक नया मुकाम हासिल किया है। रिटेल बिक्री में पिछले साल के मुकाबले **63%** का ज़बरदस्त उछाल देखा गया, जो **3.06 लाख यूनिट** तक पहुंच गई। इस वृद्धि ने देश में EV की मार्केट पैठ (Market Penetration) को पहली बार **12%** के पार पहुंचा दिया है।
टू-व्हीलर और कार सेगमेंट में बंपर डिमांड!
इस शानदार वृद्धि का बड़ा श्रेय टू-व्हीलर और पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट को जाता है।
- टू-व्हीलर: इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की बिक्री में करीब 75% की बढ़ोतरी हुई, जो जून में 1,93,735 यूनिट रही। पिछले साल इसी अवधि में यह 1,10,719 यूनिट थी। अब इस सेगमेंट में EV की पैठ 10.6% हो गई है, जो शहरी इलाकों में व्यक्तिगत आवागमन के लिए ई-स्कूटर और ई-बाइक की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
- पैसेंजर व्हीकल: पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में भी बिक्री दोगुनी से ज़्यादा होकर 31,823 यूनिट तक पहुंच गई।
- थ्री-व्हीलर: थ्री-व्हीलर सेगमेंट, जो पहले से ही काफी हद तक विद्युतीकृत है, में 27.38% की वृद्धि के साथ बिक्री 77,448 यूनिट रही। देश में होने वाली कुल थ्री-व्हीलर बिक्री में 64% से ज़्यादा अब इलेक्ट्रिक वाहनों का है, जो लॉजिस्टिक्स और लास्ट-माइल डिलीवरी सेक्टर में इनकी स्वीकार्यता को दिखाता है।
ऑटो इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव
यह बदलाव अब सिर्फ नई कंपनियों तक सीमित नहीं है। पुरानी और स्थापित ऑटोमोबाइल निर्माता कंपनियां भी अपने डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का फायदा उठाकर मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही हैं। घरेलू कंपनियों के साथ-साथ विदेशी कंपनियां भी भारत को EV मैन्युफैक्चरिंग और बिक्री का एक अहम हब बनाने की तैयारी में हैं।
आगे क्या?
हालांकि, निवेशकों को ध्यान देना होगा कि इस ग्रोथ की लंबी अवधि की स्थिरता कई फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। ग्राहकों की बढ़ती चाहत और बेहतर अफोर्डेबिलिटी फिलहाल बिक्री को सहारा दे रही है, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और सरकारी इंसेंटिव्स का बने रहना इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा। इंडस्ट्री अब सब्सिडी पर निर्भर मॉडल से हटकर एक सेल्फ-सस्टेनिंग इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, जहां 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' खरीदारों के लिए मुख्य आकर्षण बनेगा।
ऑटो सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, मंथली रिटेल रजिस्ट्रेशन डेटा और मार्केट में कॉम्पिटिशन की स्थिति पर नजर रखना ज़रूरी होगा। साथ ही, कंपनियां अपनी प्रॉफिट मार्जिन को कैसे मैनेज करती हैं, यह भी देखने लायक होगा।
