भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रमुख कार निर्माता कंपनियां अब Battery-as-a-Service (BaaS) मॉडल को अपना रही हैं, जिसका मकसद EVs को आम ग्राहकों के लिए और भी किफायती बनाना है।
यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि भारत में EV की बिक्री लगातार बढ़ रही है। फाइनेंशियल ईयर 2024 में EV की कुल बिक्री 12 लाख यूनिट के पार पहुंच गई, जिसमें पैसेंजर EVs की हिस्सेदारी करीब 8 लाख यूनिट रही। कुल वाहन बिक्री में EV की पैठ (penetration) करीब 6.5% तक पहुंच गई है, जो पिछले साल से काफी ज्यादा है।
किफ़ायती बनाने की कोशिश
Battery-as-a-Service (BaaS) मॉडल में, बैटरी की कीमत को कार की कीमत से अलग कर दिया जाता है। इससे ग्राहकों को इलेक्ट्रिक कार बहुत कम शुरुआती कीमत पर मिल जाती है। बैटरी का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें 'जितना इस्तेमाल, उतना भुगतान' (pay-per-use) या सब्सक्रिप्शन के आधार पर पैसे देने होते हैं। उदाहरण के लिए, Tata Motors अपनी Punch EV को BaaS मॉडल के साथ पेश कर रही है। इससे कार की शुरुआती कीमत ₹9.69 लाख से घटकर ₹6.49 लाख हो जाती है, और बैटरी के लिए प्रति किलोमीटर ₹2.6 का अतिरिक्त चार्ज लगता है। इसी तरह, JSW MG Motor अपनी Windsor EV के लिए BaaS का विकल्प देती है, जिसमें बैटरी के इस्तेमाल के आधार पर लगभग ₹5,250 प्रति माह का भुगतान करना होता है। इस तरीके से कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों को आकर्षित करने और उन्हें EV खरीदने के लिए प्रेरित करने का लक्ष्य है।
रणनीति में बड़ा बदलाव
यह रणनीति पिछली सोच से बिल्कुल अलग है। पहले Tata Motors जैसी कंपनियां पैसेंजर व्हीकल्स के लिए BaaS मॉडल को लेकर संशय में थीं। हालांकि, 2030 तक कुल वाहन बिक्री में EV की 30% हिस्सेदारी हासिल करने जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरा करने की जरूरत को देखते हुए अब कंपनियों ने अपनी रणनीति बदली है। पहले FAME II जैसी सरकारी स्कीमें EV की खरीद को सस्ता बनाती थीं, लेकिन अब इन मॉडलों पर निर्भरता कम करने के लिए BaaS जैसे नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।
मालिकाना हक, टैक्स और अनिश्चितता की चुनौतियाँ
कम शुरुआती कीमत के आकर्षण के बावजूद, BaaS मॉडल को कुछ बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी चुनौती भारतीय ग्राहकों की 'मालिकाना हक' (ownership) की चाहत है। ग्राहक अक्सर कार और उसके पुर्जों, खासकर बैटरी को अपना मानना और खरीदना पसंद करते हैं। इसके अलावा, टैक्स का मामला भी एक बड़ी रुकावट है। जहां EV खरीदने पर केवल 5% GST लगता है, वहीं BaaS के तहत बैटरी किराए पर लेने या इस्तेमाल करने पर 18% GST चुकाना पड़ता है। यह टैक्स का अंतर लंबी अवधि में BaaS ग्राहकों के लिए यह महंगा सौदा साबित हो सकता है। साथ ही, भविष्य की सरकारी नीतियों या बैटरी की परफॉरमेंस गारंटी को लेकर भी चिंताएं बनी रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि BaaS से फिलहाल शोरूम तक ग्राहक जरूर आ सकते हैं, लेकिन इन चिंताओं के कारण इसका वास्तविक और दीर्घकालिक इस्तेमाल करने वाले ग्राहक शायद कम ही हों।
BaaS का भविष्य
Battery-as-a-Service अभी भारतीय EV इकोसिस्टम में बिल्कुल शुरुआती दौर में है। उम्मीद है कि भविष्य में इसमें और सुधार होंगे और शायद खास BaaS प्रोवाइडर भी सामने आएंगे। यह मॉडल फिलहाल शुरुआती लागत को कम करके ग्राहकों की रुचि बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह ग्राहकों की मालिकाना हक की चिंताओं को कैसे दूर करता है, लंबी अवधि में ग्राहकों को इसका क्या फायदा मिलता है, और यह टैक्स व रेगुलेटरी माहौल में कैसे टिक पाता है।