भारत की प्रमुख इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) कंपनियों के हालिया नतीजे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वे लगातार बढ़ती लागतों के बीच अपने कारोबार को बढ़ा तो रही हैं, लेकिन उन्हें अभी भी टिकाऊ मुनाफे के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
बढ़ते इंपोर्ट खर्च का असर
EV बनाने के लिए ज़रूरी अहम पार्ट्स जैसे रेयर अर्थ मैग्नेट, लिथियम-आयन बैटरी और मेमोरी चिप्स की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी सीधे तौर पर भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के मुनाफे पर असर डाल रही है। भारत में इन ग्लोबल प्राइस हाइक्स का असर इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि हम इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं; लगभग 60% EV कंपोनेंट्स विदेशों से मंगाए जाते हैं। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का लगातार कमजोर होना, जो फिलहाल करीब ₹95 पर कारोबार कर रहा है, इन इंपोर्ट की लागतों को काफी बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए, मेमोरी चिप्स (DRAM और NAND फ्लैश) की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है, कुछ सेगमेंट्स में तो 2026 की शुरुआत में ही यह 80-90% तक बढ़ गई हैं। वहीं, लिथियम-आयन बैटरी पैक की कीमतें 2026 तक $110/kWh से नीचे जाने की उम्मीद है, लेकिन लिथियम जैसे कच्चे माल की बढ़ती कीमतें भी लागत पर दबाव बढ़ा रही हैं।
Ather, Euler का ग्रोथ, पर घाटा बरकरार
Ather Energy ने फाइनेंशियल ईयर 26 में ₹3,671.76 करोड़ का शानदार रेवेन्यू दर्ज किया, लेकिन इस अवधि में उसे ₹517.17 करोड़ का नेट लॉस (शुद्ध घाटा) भी हुआ। 9M FY25 तक कंपनी की मार्केट कैपिटलाइजेशन ₹34,393 करोड़ थी। Euler Motors का रेवेन्यू भी बढ़ा है, फाइनेंशियल ईयर 26 में यह दोगुना से ज्यादा होकर ₹402 करोड़ पर पहुँच गया, लेकिन कंपनी को ₹308 करोड़ का घाटा हुआ। घाटे के बावजूद, Euler Motors ने अपने ऑपरेशंस को बेहतर बनाया है, रेवेन्यू के मुकाबले घाटे को कम किया है और अपने EBITDA मार्जिन को -62.9% तक सुधारा है। हालांकि, Euler का अनुमान है कि कंपनी को मुनाफे में आने के लिए ₹2,000-2,500 करोड़ के रेवेन्यू की जरूरत होगी, जो अगले दो से तीन साल में पूरा होने की उम्मीद है।
लागत कम करने के इंजीनियरिंग उपाय
कंपनियाँ इन बढ़ती लागतों का सामना करने के लिए इंजीनियरिंग इनोवेशन पर जोर दे रही हैं। Ather Energy नए प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है, जिनका मकसद एल्युमीनियम और कॉपर जैसे महंगे मटीरियल पर निर्भरता कम करना है। Euler Motors ने कमोडिटी की लागत में हुई बढ़ोतरी का एक बड़ा हिस्सा खुद सोख लिया है और इसका थोड़ा सा हिस्सा ही ग्राहकों पर डाला है। इसके अलावा, हाई-मार्जिन वाले सॉफ्टवेयर और एक्सेसरीज को इंटीग्रेट करने और LFP जैसी वैकल्पिक बैटरी केमिस्ट्री पर काम चल रहा है, जो अपनी कम कीमत के कारण लोकप्रियता हासिल कर रही है। फिर भी, यह उम्मीद नहीं है कि ये उपाय ग्लोबल कमोडिटी महंगाई और करेंसी की गिरावट के मिले-जुले असर का पूरी तरह से मुकाबला कर पाएंगे।
इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ाती है जोखिम
भारतीय EV मैन्युफैक्चरर्स के लिए सबसे बड़ा जोखिम उनकी इंपोर्ट पर संरचनात्मक निर्भरता है। यह निर्भरता सेक्टर को करेंसी के उतार-चढ़ाव के प्रति बहुत संवेदनशील बनाती है; 2009 में ₹36-40 से गिरकर आज करीब ₹95 तक पहुँचे रुपये ने इंपोर्ट लागतों को काफी बढ़ा दिया है। सरकार ने $35,000 से ऊपर की इलेक्ट्रिक कारों पर 15% कंसेशनल इंपोर्ट ड्यूटी जैसे उपाय पेश किए हैं (जिनके लिए महत्वपूर्ण निवेश प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता होती है), लेकिन ज्यादातर कंपोनेंट्स पर अभी भी 10% से 28% तक की बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) और अन्य टैक्स लगते हैं। कमोडिटी की कीमतों में आखिरकार कमी आने की उम्मीद अनिश्चित बनी हुई है; AI एप्लीकेशंस से मेमोरी चिप्स की मांग 2028 के बाद भी कीमतें ऊंची रख सकती है, और लिथियम की कीमतें 2026 में फिर से बढ़ रही हैं। Ather Energy और Euler Motors दोनों ही लगातार नेट लॉस रिपोर्ट कर रही हैं, और प्रॉफिटेबल बनने के लिए उन्हें निरंतर निवेश की आवश्यकता है। इन लगातार बाहरी दबावों को देखते हुए, यह समय-सीमा अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
