भारत का EV मिशन खतरे में? पूर्व NITI Aayog अधिकारी ने जताई चिंता, जानें क्यों

AUTO
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का EV मिशन खतरे में? पूर्व NITI Aayog अधिकारी ने जताई चिंता, जानें क्यों
Overview

भारत को इलेक्ट्रिक वाहन (EV) हब बनाने के लक्ष्य पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। NITI Aayog के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी, डॉ. रणधीर सिंह, ने चेतावनी दी है कि सरकार के प्रस्तावित CAFE-III फ्यूल एफिशिएंसी (Fuel Efficiency) नियम देश के EV ट्रांज़िशन को धीमा कर सकते हैं।

Instant Stock Alerts on WhatsApp

Used by 10,000+ active investors

1

Add Stocks

Select the stocks you want to track in real time.

2

Get Alerts on WhatsApp

Receive instant updates directly to WhatsApp.

  • Quarterly Results
  • Concall Announcements
  • New Orders & Big Deals
  • Capex Announcements
  • Bulk Deals
  • And much more

प्राइम मिनिस्टर ऑफिस (PMO) में इस वक्त CAFE-III नॉर्म्स की समीक्षा हो रही है। इसका मुख्य मकसद है वाहनों के बेड़े (fleet) से होने वाले CO2 उत्सर्जन को काफी कम करना, यानी अप्रैल 2027 से प्रति किलोमीटर 91.7 ग्राम CO2 का लक्ष्य रखा गया है। यह CAFE-II के 113 ग्राम प्रति किलोमीटर के लक्ष्य से कहीं ज़्यादा आक्रामक है। लेकिन, डॉ. सिंह का मानना है कि इन नियमों में कुछ ऐसी खामियां हैं जो EV की ओर भारत के कदम को रोक सकती हैं।

हाइब्रिड कारों को मिल रही ज़्यादा रियायतें!

सबसे बड़ी चिंता है स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड (Strong Hybrid) वाहनों को मिलने वाली भारी रियायतें। डॉ. सिंह बताते हैं कि ये गाड़ियां, जिनमें पेट्रोल इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों होते हैं, अभी भी हर किलोमीटर पर 80-100 ग्राम CO2 उत्सर्जित करती हैं। इसके बावजूद, प्रस्तावित नियमों के तहत इन्हें 2x तक का क्रेडिट मिल सकता है, जो प्योर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (BEVs) के लगभग बराबर है। अगर ये फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) का इस्तेमाल करें तो कार्बन न्यूट्रलिटी फैक्टर (Carbon Neutrality Factor) से यह और भी बढ़ सकता है। यह वैसा ही है मानो आप पूरी तरह से क्लीन EV और ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले हाइब्रिड को एक ही श्रेणी में रख रहे हों। जबकि चीन और यूरोप जैसे देश हाइब्रिड को मिल रहे क्रेडिट कम कर रहे हैं, भारत में इसका उल्टा हो रहा है।

छोटे वाहनों की सुरक्षा पर खतरा?

दूसरी चिंता 909 किलोग्राम से कम वज़न वाले छोटे वाहनों को मिलने वाली छूट को लेकर है। ऑटोमोबाइल कंपनियों की चिंता है कि इससे मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) सुरक्षा और वाहन की बॉडी स्ट्रक्चर (vehicle structure) से समझौता कर सकते हैं, ताकि वज़न कम किया जा सके। यह भारत के Bharat NCAP प्रोग्राम के तहत क्रैश सेफ्टी (crash safety) को बेहतर बनाने के प्रयासों के खिलाफ़ है। Tata Motors, Mahindra & Mahindra, और JSW MG जैसी कंपनियों ने भी इस पर चिंता जताई है कि ऐसी छूट से बाज़ार में गड़बड़ी हो सकती है और सुरक्षा से समझौता हो सकता है।

हाइब्रिड अब 'ब्रिज टेक्नोलॉजी' नहीं?

पहले हाइब्रिड को एक ज़रूरी 'ब्रिज टेक्नोलॉजी' (bridge technology) या पुल माना जाता था, लेकिन अब इनकी अहमियत पर सवाल उठ रहे हैं। दुनिया भर में बैटरी की कीमतें $100 प्रति kWh से नीचे आ गई हैं, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (charging infrastructure) 12,000 स्टेशनों से ज़्यादा हो गया है, और ज़्यादातर EVs अब 300 किलोमीटर से ज़्यादा की रेंज दे रही हैं। ऐसे में, हाइब्रिड को ट्रांज़िशन के लिए महत्वपूर्ण कदम मानने का तर्क कमज़ोर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाइब्रिड तकनीक में भारी इन्वेस्टमेंट (investment) शायद वास्तव में इलेक्ट्रिक वाहन बनाने के पैसे को रोक रहा है।

EVs का ग्रीन एडवांटेज

कुछ लोगों का कहना है कि भारत में बिजली कोयले से बनती है, इसलिए EVs भी पर्यावरण के लिए उतनी क्लीन नहीं हैं। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि EVs बिजली का इस्तेमाल कहीं ज़्यादा कुशलता से करती हैं। प्योर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बिजली की लगभग 90% एनर्जी को गति में बदलती हैं, जबकि पेट्रोल इंजन इसकी सिर्फ 25% से भी कम एनर्जी का इस्तेमाल कर पाते हैं। एक EV के पूरे जीवनकाल (lifetime) में होने वाले उत्सर्जन का अध्ययन बताता है कि भारत में वे पेट्रोल या डीजल कारों की तुलना में 38% तक कम उत्सर्जन करती हैं। और जैसे-जैसे भारत का पावर ग्रिड (power grid) ज़्यादा क्लीन हो रहा है (आधा से ज़्यादा बिजली अब नॉन-फॉसिल सोर्स से आ रही है), यह आंकड़ा और भी बेहतर होगा।

असली EV ट्रांज़िशन के लिए सुझाव

डॉ. सिंह का सुझाव है कि ऐसे नियम बनाए जाएं जो भारत के EV लक्ष्यों का सीधा समर्थन करें। इनमें छोटे वाहनों के लिए वज़न की छूट खत्म करना, हाइब्रिड को ज़्यादातर पेट्रोल कारों की तरह मानना और उन्हें बहुत कम क्रेडिट देना, और फ्लेक्स-फ्यूल या बायोगैस वाली गाड़ियों को ज़ीरो-एमिशन (zero-emission) न गिनना शामिल है। प्योर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को ही एकमात्र ज़ीरो-एमिशन कैटेगरी में रखना निवेशकों का विश्वास बनाए रखने और बैटरी इंडस्ट्री को सहारा देने के लिए ज़रूरी है। अगर ये बाज़ार की गड़बड़ियां जारी रहीं, तो भारत क्लीन ट्रांसपोर्ट की ओर अपने पांच महत्वपूर्ण साल गंवा सकता है।

Get stock alerts instantly on WhatsApp

Quarterly results, bulk deals, concall updates and major announcements delivered in real time.

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.