India EV Component Market: 2032 तक ₹3.55 लाख करोड़ पार, ऑटो सप्लायर्स के लिए बड़ा मौका

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India EV Component Market: 2032 तक ₹3.55 लाख करोड़ पार, ऑटो सप्लायर्स के लिए बड़ा मौका

भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) कंपोनेंट मार्केट 2032 तक 3.55 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह 2025 के मुकाबले आठ गुना ज्यादा होगा। डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस से ऑटो सप्लायर्स को बड़ा फायदा होगा, लेकिन बैटरी पैक जैसे अहम पार्ट्स के लिए इंपोर्ट पर निर्भरता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग और लोकलाइजेशन में बड़े बदलाव

साफ-सुथरी मोबिलिटी (Clean Mobility) को बढ़ावा देने के कारण डोमेस्टिक ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) EV कंपोनेंट्स की लोकल सोर्सिंग बढ़ा रहे हैं। फिलहाल, बैटरी पैक कंपोनेंट मार्केट का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, जिनकी लागत 50% से ज्यादा है। हालांकि इस मौके का स्केल बड़ा है, लेकिन कंपनियों को इंपोर्ट पर निर्भरता की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। EV की लागत का लगभग 60% हिस्सा अभी भी इंपोर्टेड कंपोनेंट्स से जुड़ा है, खासकर बैटरी पैक और पावर इनवर्टर जैसे हाई-वैल्यू सेगमेंट में।

दूसरी ओर, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) और इलेक्ट्रिक मोटर जैसे सेगमेंट में तेजी से लोकलाइजेशन हो रहा है। ये एरिया कम कैपिटल-इंटेंसिव हैं और भारत में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट पर बढ़ते फोकस का फायदा उठा रहे हैं। इससे डोमेस्टिक फर्म्स हार्डवेयर-हैवी सेगमेंट की तुलना में ज्यादा वैल्यू कैप्चर कर पा रही हैं। इन्वेस्टर्स के लिए, लोकल मैन्युफैक्चरर्स की सिंपल असेंबली से आगे बढ़कर इन सब-सिस्टम्स में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) हासिल करने की क्षमता लंबी अवधि की प्रॉफिटेबिलिटी तय करेगी।

स्ट्रेटेजिक रिस्क और कैपिटल इंटेंसिटी का मैनेजमेंट

हालांकि सेक्टर की ग्रोथ का आउटलुक मजबूत है, लेकिन ट्रांजिशन में काफी कैपिटल खर्च शामिल है। जो कंपनियां फिलहाल रिसर्च, डेवलपमेंट और सप्लाई चेन रेजिलिएंस में निवेश कर रही हैं, वे बड़े ऑटोमोटिव फर्म्स के लिए की पार्टनर्स के रूप में खुद को पोजिशन कर रही हैं। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी पर भारी कैपिटल खर्च में जोखिम है, खासकर अगर खास EV मॉडल्स की डिमांड उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती है या ग्लोबल रॉ मैटेरियल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है।

इसके अलावा, सेक्टर की सफलता लोकलाइजेशन से जुड़ी सरकारी नीतियों पर निर्भर करती है, जैसे FAME स्कीम और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) प्रोग्राम, जो विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इन्वेस्टर्स को इन नीतियों के विकास पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये सीधे डोमेस्टिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करती हैं। कॉम्पिटिटिव लैंडस्केप भी उन फर्म्स द्वारा परिभाषित किया जाएगा जो हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में निवेश की जरूरत और तेजी से विकसित हो रहे मार्केट में लीन बैलेंस शीट बनाए रखने के दबाव को सफलतापूर्वक संतुलित कर सकती हैं।

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