India EV Market: अमीर खरीदारों की मौज! लग्जरी इलेक्ट्रिक कारें रॉकेट बनीं, आम आदमी को झटका

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India EV Market: अमीर खरीदारों की मौज! लग्जरी इलेक्ट्रिक कारें रॉकेट बनीं, आम आदमी को झटका
Overview

भारत का इलेक्ट्रिक कार मार्केट एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। जहाँ ₹20 लाख से ऊपर की लग्जरी इलेक्ट्रिक कारों की डिमांड रॉकेट की तरह बढ़ी है और उनका मार्केट शेयर कई गुना बढ़ा है, वहीं कम कीमत वाली एंट्री-लेवल इलेक्ट्रिक कारों की मांग घट गई है, जिससे उनका मार्केट शेयर आधा रह गया है।

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प्रीमियम सेगमेंट में तूफानी तेजी

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का बाजार तेजी से बदल रहा है, और ग्राहक अब ऊंचे दामों वाले सेगमेंट की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY26) में ₹20 लाख से ₹30 लाख की रेंज वाली कारों का मार्केट शेयर बढ़कर 26.4% हो गया, जो दो साल पहले सिर्फ 6.2% था। वहीं, ₹30 लाख से ऊपर की कीमत वाली इलेक्ट्रिक कारों का हिस्सा भी दोगुना होकर 14.2% तक पहुंच गया। इस जबरदस्त बदलाव की मुख्य वजह बेहतर मॉडल्स की उपलब्धता, एडवांस्ड फीचर्स और ऐसे कंज्यूमर हैं जो कीमतों को लेकर कम संवेदनशील हैं।

अल्ट्रा-लग्जरी डिमांड में उछाल

₹40 लाख से महंगी इलेक्ट्रिक कारों की मांग दो साल में दोगुनी होकर FY26 में करीब 5,400 यूनिट्स तक पहुंच गई है। प्रीमियम कार मेकर्स जैसे Mercedes Benz India का कहना है कि उनकी अल्ट्रा-लग्जरी पोर्टफोलियो (₹1.4 करोड़ से शुरू) में अब 20% हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक कारों की है। कंपनी की ₹55 लाख से ऊपर की CLA BEV पहली खेप में ही सोल्ड आउट हो गई। वहीं, BMW की कुल बिक्री में इलेक्ट्रिक कारों का हिस्सा 25% से अधिक है। यह हाई-एंड सेगमेंट में लगातार बनी हुई डिमांड दिखाता है कि ब्रांड लॉयल्टी और खर्च करने की क्षमता के कारण ग्राहक ऊंची कीमत वाले ई.वी. को आसानी से अपना रहे हैं।

एंट्री-लेवल मॉडल्स की हालत पतली

दूसरी ओर, एंट्री-लेवल इलेक्ट्रिक कार सेगमेंट में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। ₹10 लाख से कम कीमत वाली ई.वी. का मार्केट शेयर FY24 में 18.5% से घटकर FY26 में 6.9% रह गया। ₹10 लाख से ₹20 लाख की कीमत वाली कारों का भी हिस्सा 69% से गिरकर 52.5% हो गया। मेनस्ट्रीम मेकर्स के लगभग 30 इलेक्ट्रिक कार मॉडल्स में से कुछ ही ₹10 लाख से कम कीमत में उपलब्ध हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि बहुत कम प्रॉफिट मार्जिन, सीमित मॉडल्स और सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता जैसी दिक्कतें एंट्री-लेवल ई.वी. के डेवलपमेंट में बड़ी रुकावटें हैं।

अलग-अलग कंपनियों की स्ट्रैटेजी

भारतीय ऑटो कंपनियां ई.वी. स्पेस में अलग-अलग रास्ते अपना रही हैं। जहां Tata Motors अपनी सस्ती Tiago EV और Punch EV के साथ वॉल्यूम बढ़ाने पर फोकस कर रही है, वहीं Mahindra और JSW MG Motor जैसी कंपनियां ₹19 लाख से ऊपर और ₹60 लाख की कीमत वाली एसयूवी और एमपीवी को टारगेट कर रही हैं। Hyundai और Kia भी प्रीमियम ई.वी. सेगमेंट में भारी निवेश कर रही हैं, जो तत्काल मास सेल्स की बजाय ऊंचे मुनाफे को प्राथमिकता देने का संकेत देता है।

कीमत ही है मुख्यThe India EV Market's future is at a crossroads, with luxury car sales booming while mass-market adoption struggles due to affordability issues. The share of EVs priced over ₹20 lakh has quadrupled, while entry-level models have seen their market share halve. This divide poses a challenge for widespread EV penetration and sustainable growth. hurdles

प्रीमियम सेगमेंट भले ही फल-फूल रहा हो, लेकिन असली चुनौती हर किसी के लिए ई.वी. को किफायती बनाना है। बैटरी टेक्नोलॉजी की लागत, मैन्युफैक्चरिंग की जटिलताएँ और एंट्री-लेवल मॉडल्स के लिए सब्सिडी की जरूरत एक बड़ी आर्थिक बाधा पैदा करती है। Jato Dynamics के रवि भाटिया कहते हैं कि मार्केट को बढ़ाने के लिए सिर्फ कीमतों में बदलाव नहीं, बल्कि असल प्रॉडक्ट इनोवेशन जरूरी है। लागत कम करने में बड़ी सफलता या नीतियों में बड़े बदलाव के बिना, ई.वी. का विकास अमीर खरीदारों तक ही सीमित रहने का खतरा है, जो इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट को अपनाने की गति को धीमा कर देगा।

मार्केट का भविष्य: दो-स्तरीय खतरा

वर्तमान ट्रेंड से मार्केट में एक स्थायी विभाजन हो सकता है, जहाँ एक तरफ बढ़ता हुआ प्रीमियम सेगमेंट हो और दूसरी तरफ संघर्ष करता हुआ मास मार्केट। हाई-प्रॉफिट प्रीमियम ई.वी. पर ध्यान केंद्रित करके, कंपनियां ज्यादातर भारतीय उपभोक्ताओं के लिए अफोर्डेबिलिटी की समस्या को हल करने के बजाय मुनाफे को चुन रही हैं। इससे आम लोगों के लिए सचमुच किफ़ायती ई.वी. की उपलब्धता धीमी हो सकती है। यह पेट्रोल/डीजल कारों (ICE) के विकास से बहुत अलग है, जो धीरे-धीरे सभी के लिए सस्ती हो गईं। बैटरी की लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से बढ़ी अफोर्डेबिलिटी की खाई का मतलब है कि भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा सालों तक ई.वी. खरीदने से वंचित रह सकता है, जो राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को खतरे में डाल सकता है।

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