भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच एक बड़ी ट्रेड डील पर सहमति बनी है, जिसमें वाहनों के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए नए कोटा तय किए गए हैं। यह समझौता भारतीय ऑटो एक्सपोर्ट के लिए रास्ते खोलेगा, लेकिन प्रीमियम कार सेगमेंट में विदेशी कंपनियों से कड़ी टक्कर भी बढ़ सकती है।
भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अब अपने अंतिम चरण में है, जो दोनों क्षेत्रों के ऑटोमोटिव सेक्टर की तस्वीर बदलने वाला है।\n\n### इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का नया गणित\n\nडील के तहत EU से भारत आने वाली कारों के लिए शुरुआती सालाना कोटा 1,00,000 यूनिट तय किया गया है, जो 10 साल में बढ़कर 1,60,000 यूनिट हो जाएगा। इन पर लगने वाली ड्यूटी पांचवें साल तक घटकर 10% रह जाएगी। खास बात यह है कि यह छूट केवल उन गाड़ियों पर मिलेगी जिनकी कीमत €15,000 (करीब ₹13-14 लाख) से अधिक है, ताकि भारत की मास-मार्केट सेगमेंट सुरक्षित रहे।\n\nवहीं, भारतीय कंपनियों के लिए यूरोप के दरवाजे खुल रहे हैं। पहले साल में 2,50,000 और 10 सालों में 4,00,000 भारतीय गाड़ियों का निर्यात यूरोप को किया जा सकेगा। पांच साल के भीतर भारतीय कारों पर टैरिफ घटकर 0% हो जाएगा। इसमें इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं।\n\n### निवेशकों के लिए चुनौतियां और मौके\n\nयह डील घरेलू कंपनियों के लिए डबल-एज्ड स्वॉर्ड (Double-edged sword) जैसी है। जहाँ एक तरफ भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को ग्लोबल मार्केट मिलेगा, वहीं लग्जरी और प्रीमियम सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। सबसे बड़ा रिस्क 'रूल ऑफ ओरिजिन' (Rules of Origin) का है—कहीं ऐसा न हो कि चीन जैसी जगहों पर बनी गाड़ियां EU के रास्ते भारत में एंट्री पा लें। सरकार इस पर कड़ी निगरानी रखने की तैयारी में है।\n\n### अन्य बड़े बदलाव\n\nसिर्फ गाड़ियां ही नहीं, इस डील में कृषि उत्पादों जैसे अंगूर, प्याज और घी के लिए भी विशेष कोटा तय किया गया है। अभी यह ड्राफ्ट स्टेज पर है, जिसके 2026 के अंत तक साइन होने और 2027 से लागू होने की उम्मीद है। निवेशकों की नजर अब इस डील की फाइनल साइनिंग और व्हीकल इम्पोर्ट स्टैंडर्ड्स पर टिकी होगी।
