भारत में इलेक्ट्रिक बस मार्केट ने बड़ी छलांग लगाई है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही में ई-बस की बिक्री **55%** बढ़कर **3,723** यूनिट्स पर पहुंच गई है, जबकि पारंपरिक बस बाजार में गिरावट देखी गई है।
भारत के ऑटो सेक्टर में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पारंपरिक बसों की बिक्री में 0.4% की गिरावट दर्ज की गई और कुल बिक्री 43,561 यूनिट्स रही, वहीं इलेक्ट्रिक बस सेगमेंट 55% की ग्रोथ के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है।
सरकारी योजनाओं का दम
इस ग्रोथ के पीछे PM E-DRIVE और PM-eBus Sewa जैसी सरकारी स्कीमों का बड़ा हाथ है। इन योजनाओं के तहत 'ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट' (GCC) मॉडल को अपनाया गया है। इस मॉडल में प्राइवेट ऑपरेटर बसें खरीदते हैं और मेंटेन करते हैं, जबकि शहर की ट्रांसपोर्ट एजेंसियां प्रति किलोमीटर के हिसाब से फीस चुकाती हैं। इससे शहरों पर भारी खर्च का बोझ नहीं पड़ता और इलेक्ट्रिक बसों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
मार्केट में कंपनियों के बीच टक्कर
इस सेक्टर में Tata Motors और Ashok Leyland जैसे दिग्गजों का मुकाबला JBM Auto और Olectra Greentech जैसी कंपनियों से है। JBM Auto के पास तो 10,000 से ज्यादा ई-बसों का ऑर्डर बुक मौजूद है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि जो कंपनियां इन सरकारी टेंडर्स को जीतने और उन्हें समय पर पूरा करने में सक्षम होंगी, वही लंबी अवधि में मुनाफा कमाएंगी।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
ग्रोथ तो दिख रही है, लेकिन कुछ रिस्क भी हैं। सबसे बड़ा रिस्क लिथियम-आयन सेल्स के आयात पर निर्भरता है। ग्लोबल लेवल पर कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे कंपनियों के मार्जिन पर असर डालता है। इसके अलावा, स्टेट ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग्स (STUs) की वित्तीय स्थिति भी एक चिंता का विषय है। अगर सरकारी एजेंसियों को फंडिंग की समस्या हुई, तो ऑपरेटरों को समय पर पेमेंट मिलने में देरी हो सकती है, जो पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है।
